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मध्यप्रदेश

MP में 30 साल बाद लौटा ‘जंगल का यमराज’! साल के कीमती पेड़ों पर बोरर कीट का भीषण हमला, वन विभाग में मचा हड़कंप

जबलपुर: प्रकृति प्रेमियों के लिए एक बुरी खबर है. मध्य प्रदेश के साल के सदाबहार जंगलों में साल बोरर नाम के एक कीडे को बड़े पैमाने पर देखा जा रहा है. इसकी वजह से लाखों पेड़ प्रभावित हो गए हैं. आज से लगभग 25 साल पहले भी इस कीड़े की वजह से साल के लाखों पेड़ों को काटना पड़ा था. वैज्ञानिकों का कहना है कि, ‘यह साइकिल रिपीट हो रही है और यदि जल्द ही इसे नहीं रोका गया तो आने वाले सालों में यह कीड़ा और अधिक विस्तार कर सकता है.

अमरकंटक के जंगलों में फैला बोरर कीट
स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉक्टर उदय होमकर को बीते दिनों अमरकंटक रेंज के वन विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी कि, अमरकंटक के पास के जंगल में साल के कुछ पेड़ों के पास कई पेड़ों के नीचे लकड़ी का बुरादा दिख रहा है. डॉ उदय होमकर 10 नवंबर को अमरकंटक पहुंचे और उन्होंने देखा कि यह बुरादा साल के पेड़ों में साल बोरर नाम का कीट बना रहा है.

लाखों पेड़ खतरे के साए में
डॉ. उदय होमकर को तुरंत यह समझ में आ गया कि, यह साल बोरर का अटैक है. जिस स्थान पर साल के पेड़ों में यह समस्या पाई गई वहां 60% पेड़ों में साल बोरर का अटैक देखा गया. लेकिन जब बड़े पैमाने पर सर्वे किया गया तो केवल अमरकंटक में लगभग 2% साल के पेड़ इस समस्या से ग्रसित पाए गए. यहां पर लगभग 8000 वर्ग किलोमीटर में साल का जंगल है और यहां पर 40 लाख साल के पेड़ हैं.

ऐसी ही रिपोर्ट डिंडोरी से भी आई है. डिंडोरी के समनापुर ब्लॉक में साल के हजारों पेड़ों में साल बोरर का असर देखा गया है. इस रिपोर्ट के आने के बाद जबलपुर, डिंडोरी, मंडला, उमरिया, शहडोल सभी जगह पर साल के जंगलों में बोरर की जांच शुरू कर दी गई है.

पेड़ के अंदर अंडे देती है मादा बोरर
डॉ. उदय होमकर ने बताया कि, ”साल बोरर का कीड़ा बरसात के दिनों में साल के पेड़ों में निकलने वाली गोंद को खाने के लिए आता है. यही वह धीरे से इसमें छेद बना लेता है और छेद बनाकर अगले कई महीनों तक पेड़ के अंदर ही अपना घर बना लेता है. एक मादा 200 अंडे देती है जो सब इसी पेड़ के भीतर बढ़ते रहते हैं. इसी दौरान वह पेड़ में बने छेद से बुरादा बाहर गिराते हैं.”

डॉ उदय होमकर का कहना है कि, ”उन्हें उस जंगल में आठ किस्म के पौधे मिले. कुछ ऐसे थे जो इस कीड़े के अटैक की वजह से सूख गए थे. कुछ ऐसे थे जिनका एक हिस्सा सूख गया था. कुछ के 50% हिस्से को बोरर ने सूखा दिया, कुछ पौधे ऐसे भी थे जो मुरझा रहे थे. लेकिन बाद में इनके ठीक होने की संभावना थी.”

200 साल जिंदा रहते हैं साल के पेड़
साल के पेड़ की उम्र 200 साल से ज्यादा हो सकती है. कान्हा के जंगलों में 200 साल से ज्यादा पुराना पेड़ जिंदा था. साल का पेड़ इमारती लकड़ियों में ग्रीन स्टील के नाम से जाना जाता है. रेलवे में पहले जब सीमेंट की जगह लकड़ी का प्रयोग किया जाता था तो साल की लकड़ी के ही स्ली पाट बनाए जाते थे. यह लकड़ी बेहद मजबूत होती है. इसका पेड़ एकदम सीधा 40 फीट तक ऊंचा हो जाता है. हर साल साल के पेड़ों की कटाई से सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता है.

इस तरह मारा जाता है कीटों को
उदय होमकर ने बताया कि, ”साल बोरर के कीडे़ को मारने के लिए एक ट्रैप लगाया जाता है. जिसमें साल के ही एक पेड़ की छाल को कुटकर पत्तों के नीचे दबा दिया जाता है. यह कीड़ा 2 किलोमीटर दूर भी इस सुगंध को सूघ लेता है और इस सुगंध की के लिए वह उड़ा चला आता है. यही इसको पकड़ कर मार दिया जाता है.”

30 साल पहले काटना पड़े थे लाखों पेड़
डॉ. उदय होमकर का कहना है कि, ”साल बोरर से ज्यादा प्रभावित पेड़ों को काटने की सलाह भी दी जाती है, ताकि दूसरे साल इनका प्रभाव ज्यादा ना बढ़ सके. 1996 से सन 2001 तक साल बोरर के प्रभाव की वजह से मध्य प्रदेश में 100000 पेड़ों की कटाई हुई थी. अब यह संख्या कहीं अधिक होगी. केवल अमरकंटक में जब 40 लाख पेड़ है तो डिंडोरी मंडल उमरिया शहडोल के जंगलों में इनकी संख्या करोड़ों में है.” साल के जंगल केवल मध्य प्रदेश में नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के जंगल में भी पाए जाते हैं. जाहिर सी बात है कि यदि मध्य प्रदेश के दो जंगलों में दो जगह पर इसकी पुष्टि हुई है तो ऐसी संभावना है की बाकी की जगहों पर भी बोरर है.

डॉ उदय होमकर ने बताया कि, ”30 साल पहले 1997 में साल बुराक का इसी तरह अटैक हुआ था. ऐसा माना जाता है कि 30 साल बाद यह प्रभाव लौटता है और अगले साल 30 साल पूरे हो रहे हैं. इसलिए वन विभाग को सतर्कता अपनानी पड़ रही है. इस साल बारिश ज्यादा होने की वजह से साल बोरर का प्रभाव ज्यादा नजर आ रहा है.”

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