लॉटरी से तय होगा मुंबई का ‘बॉस’! 22 जनवरी को खुलेगा मेयर पद का आरक्षण, जानें भाजपा-शिंदे सेना के बीच क्यों फंसा है पेच

महाराष्ट्र में निकाय चुनाव खत्म हो गए हैं और मुंबई महानगरपालिका चुनाव (बीएमसी) समेत कई निगमों पर नए मेयर को लेकर कयासों का दौर जारी है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाला महायुति गठबंधन भी अपने मेयर चुनने की कवायद में लगा है. अब लॉटरी के जरिए नए मेयर का चुनाव किया जाएगा. लेकिन नया मेयर मिलने के लिए कम से कम एक हफ्ते का इंतजार करना ही होगा.
बीएमसी सहित पूरे राज्य के 29 महानगरपालिकाओं के चुनावों के बाद मेयर पद के आरक्षण की लॉटरी को लेकर काफी चर्चा है. मेयर पद के लिए आखिर लॉटरी व्यवस्था क्या होती है? आज मंगलवार को महायुति नेताओं की एक अहम बैठक होने वाली है.
किस जाति या वर्ग से होगा मेयर
मेयर पद की आरक्षण लॉटरी वह सरकारी प्रक्रिया है, जिसके जरिए यह तय किया जाता है कि किसी महानगरपालिका में चुना जाने वाला मेयर किस जाति, वर्ग या श्रेणी से होगा. इस तरह मेयर ओपन (जनरल), ओबीसी, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), महिला (ओपन/ओबीसी/SC या ST) इनमें से किसके लिए आरक्षित होगा, यह लॉटरी सिस्टम से तय किया जाता है.
नगर निगम के इस शीर्ष पद के लिए आरक्षण लॉटरी की जरूरत क्यों पड़ती है? भारतीय संविधान और राज्य कानून के अनुसार, स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने लिए के मेयर पद का आरक्षण निकाला जाता है. ताकि हर वर्ग को नेतृत्व का अवसर मिले. इसलिए सरकार सीधे फैसला नहीं करती, बल्कि ड्रॉ (लॉटरी) के जरिए तय किया जाता है.
किस तरह से होगा लॉटरी प्रोसेस
मेयर पद की आरक्षण लॉटरी प्रोसेस किस तरह से किया जाता है? पहला, मेयर चयन के लिए नगर विकास मंत्रालय द्वारा इसका आयोजन किया जाता है. इसमें महाराष्ट्र सरकार का नगर विकास मंत्रालय (UD Department) सभी 29 महानगरपालिकाओं के लिए एक साथ लॉटरी निकालता है. दूसरा, पहले से तय आरक्षण रोस्टर(क्रम) होता है और इसमें हर महानगरपालिका के लिए आरक्षण का एक रोस्टर (क्रम) तय होता है. पिछले कार्यकाल में कौन-से वर्ग का मेयर रहा उसी के आधार पर अगला क्रम तय होता है.
तीसरा, पारदर्शी लॉटरी ड्रॉ सिस्टम के जरिए. सभी महानगरपालिकाओं के नाम अलग-अलग रखे जाते हैं. फिर अलग बॉक्स में ओपन, ओबीसी, SC, ST या फिर महिला वर्ग की पर्चियां रखी जाती हैं. सरकारी अधिकारियों की मौजूदगी में ड्रॉ निकाला जाता है. और इसके बाद ये तय होता है कि मेयर किस वर्ग से होगा और लॉटरी निकलने के बाद यह साफ हो जाता है कि मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, पुणे और नागपुर आदि नगर निगमों का मेयर किस वर्ग से चुना जाएगा.
लॉटरी के बाद मेयर का होगा चुनाव
लॉटरी सिस्टम किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि किस वर्ग का मेयर होगा, यह तय करता है. बीएमसी (मुंबई) के लिए इसका क्या मतलब है? 22 जनवरी को लॉटरी निकलते ही तय होगा. जिस वर्ग से मेयर का चयन होगा, उसी वर्ग के निर्वाचित पार्षद मेयर पद के लिए पात्र हो जाएंगे. इसके बाद ही मेयर का चुनाव होगा. निगम में सत्ता गठन की कवायद शुरू होगी.
हालांकि इस मामले में सियासत भी तेज होने की संभावना भी है. राज्य के प्रमुख दल बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे) सभी की रणनीति आरक्षण पर टिकी है. यदि महिला, SC, OBC आरक्षण आया तो कई दावेदार अपने आप ही बाहर हो जाएंगे.
बीएमसी में मेयर चुनाव की प्रक्रिया 22 जनवरी से शुरू हो रही है. पहले चरण के तहत गुरुवार को आरक्षण लॉटरी निकाली जाएगी. नगर विकास मंत्रालय सुबह 11 बजे से 29 महानगरपालिकाओं के मेयर पद का आरक्षण घोषित करेगा. इससे यह तय होगा कि मुंबई का मेयर जनरल, ओबीसी, SC, ST के साथ-साथ पुरुष या महिला किस वर्ग से होगा.
वोटिंग प्रक्रिया में सिर्फ पार्षद ही होंगे
दूसरे चरण के तहत मेयर चुनाव की अधिसूचना जारी की जाएगी. आरक्षण घोषित होने के बाद बीएमसी के आयुक्त भूषण गगरानी मेयर चुनाव की तारीख तय करेंगे, जिसमें नामांकन, प्रस्तावक-समर्थक की प्रक्रिया होती है. फिर तीसरे चरण के तहत वोटिंग कराई जाएगी जिसमें चुनकर आए 227 नगरसेवक शामिल होंगे. इसमें सिर्फ निर्वाचित नगरसेवक (पार्षद) वोट कर सकते हैं और इसमें जनता सीधे वोट नहीं करती. साधारण बहुमत से मेयर चुना जाता है.
227 सीटों वाले बीएमसी में भारतीय जनता पार्टी के पास 89 सीट है जबकि सहयोगी शिवसेना (शिंदे गुट) के पास 29 सीट है. इसके अलावा शिवसेना (यूबीटी) के 65 सीट, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के पास 6, एनसीपी (शरद पवार ) 1, कांग्रेस के पास 24 सीट, समाजवादी पार्टी के पास 2, ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के पास 8 और एनसीपी (अजित पवार) के पास 3 सीटें हैं. यहां पर बहुमत का आंकड़ा 114 है और इस तरह बीजेपी और शिंदे सेना के पास (118 सीट) स्पष्ट बहुमत है.
आरक्षण की 4 संभावित स्थिति
अगर लॉटरी के बाद मेयर पद जनरल (ओपन) हुआ तो बीजेपी को सबसे ज्यादा फायदा होगा. ऐसे में बीजेपी कहेगी कि हम सबसे बड़ी पार्टी हैं. जबकि शिंदे गुट की ओर से कहा जा रहा है कि मेयर पद के लिए ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय किया जाए. उद्धव ठाकरे गुट के बारे में कहा जा रहा है कि यह वोटिंग से दूरी बनाकर रखेगा और इस दौरान गैरहाजिर रह सकता है.
मेयर पद के लिए अगर महिला (ओपन या ओबीसी) तय हुआ तो दोनों प्रमुख दलों के सामान्य वर्ग के कई दावेदार बाहर हो जाएंगे. नई महिला का चेहरा सामने आ सकता है. मराठी महिला मेयर को लेकर महायुति सॉफ्ट इमेज बनाने की कोशिश करेगी. अब अगर मेयर पद ओबीसी के पास गया तो बीजेपी और शिंदे दोनों के पास विकल्प तो होंगे, लेकिन उम्मीदवार सीमित होंगे. नाम को लेकर अंदरूनी खींचतान भी तेज हो सकती है.
अगर मेयर का पद SC या ST के कोटे में गया तो सबसे बड़ा ट्विस्ट यह होगा कि कई बड़े नेता रेस से बाहर हो जाएंगे और कम चर्चित चेहरों को मौका मिलेगा. विपक्ष के पास भी सामाजिक न्याय बनाम सत्ता गणित नैरेटिव रहेगा.
ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला: विवाद क्यों?
बीएमसी में मेयर पद के लिए शिंदे गुट चाहता है कि ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला रखा जाए. 2.5 साल बीजेपी के लिए फिर 2.5 साल शिवसेना (शिंदे) के लिए. सूत्रों का कहना है कि बीजेपी का दावा है कि सबसे ज्यादा सीटें हमारी हैं. अभी कोई लिखित सहमति नहीं है. फिलहाल फैसला फडणवीस और शिंदे की हाई-लेवल मीटिंग पर फैसला टिका हुआ है.
वहीं यूबीटी की रणनीति का कहना है कि बीजेपी-शिंदे की लड़ाई में हमें न घसीटा जाए. शिवसेना (ठाकरे) के पार्षद मेयर वोटिंग से अनुपस्थित भी रह सकते हैं. इससे फायदा इसके गठबंधन को होगा कि उन्हें नैतिक रूप से बढ़त मिलेगी और विपक्ष की भूमिका मजबूत होगी.






