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दिल्ली/NCR

Indian Navy Power: नौसेना को मिलेगी अभेद्य सुरक्षा; 449 करोड़ के स्वदेशी ‘सैटेलाइट जैमर्स’ के लिए रक्षा मंत्रालय का समझौता

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की सुरक्षा और तकनीकी क्षमता को और अधिक मजबूत बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मंत्रालय ने बेंगलुरु की अकॉर्ड सॉफ़्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड (ASSPL) के साथ 449 करोड़ रुपए का समझौता किया है। इस समझौते के तहत नौसेना को 20 उन्नत क्षमता वाले ग्लोबल नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम (ECGNSS) जैमर्स उपलब्ध कराए जाएंगे।

🇮🇳 ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नया उदाहरण

यह समझौता ‘खरीद (भारतीय-स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित)’ श्रेणी के तहत किया गया है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुए इस सौदे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन जैमर्स में इस्तेमाल होने वाला 75 प्रतिशत सामान स्वदेशी होगा, जो प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन को एक नई उड़ान देता है।

📡 क्या है इन जैमर्स की खासियत?

ये उन्नत जैमर्स दुश्मन देश के किसी भी जहाज को भारत के समुद्री रडार के भीतर आने और कोई भी नुकसान पहुंचाने से रोकेंगे। इनकी मुख्य विशेषताएं हैं:

  • सिग्नल स्पूफिंग: प्रतिद्वंद्वी GNSS रिसीवर के सिग्नल को ट्रैक करने और उन्हें कमजोर करने की क्षमता।

  • सुरक्षित नेविगेशन: मल्टी-डैंजर वाले समुद्री वातावरण में भी नौसेना के जहाजों को सुरक्षित संचालन में मदद करना।

  • सटीक ट्रैकिंग: दुश्मन के सैटेलाइट सिग्नल अधिग्रहण को ट्रैक करके उसे बेअसर करना।

⚙️ जैमर कैसे काम करता है?

जैमर एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है जो रेडियो फ्रिक्वेंसी पर सिग्नल भेजता है, जिससे आसपास की वायरलेस सेवाएं (मोबाइल, जीपीएस, वाई-फाई) प्रभावित होती हैं। जब जैमर एक्टिव होता है, तो असली नेटवर्क सिग्नल कमजोर हो जाते हैं। नौसेना के जहाजों पर इनका उपयोग दुश्मन के संचार और नेविगेशन सिस्टम को बाधित करने के लिए किया जाएगा।

📍 जैमर्स का उपयोग और महत्व

अक्सर जैमर्स का उपयोग वीवीआईपी सुरक्षा, संवेदनशील सैन्य ठिकानों और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों पर अनचाहे संचार को रोकने के लिए किया जाता है। अब नौसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद, ये जैमर्स भारतीय समुद्री जहाजों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ का काम करेंगे।

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