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सावन में क्यों खास है हरिद्वार का कनखल? स्वामी कैलाशानंद गिरि से जानें सती के मायके और महादेव के ससुराल की महिमा

हरिद्वार: सावन (श्रावण) का महीना भगवान शिव की अनन्य भक्ति, साधना और उपासना के लिए सर्वाधिक पावन माना जाता है। इस संपूर्ण मास में शिवभक्त महादेव की प्रसन्नता हेतु जलभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में औढरदानी शिव की पूजा करने से भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी क्रम में, सावन के दौरान हरिद्वार के पौराणिक कनखल क्षेत्र में पूजन का क्या विशेष फल प्राप्त होता है, इस विषय पर निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी ने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।

🔱 वर्ष के 12 मासों में सावन का विशेष महत्व, महादेव को परम प्रिय है श्रावण मास

स्वामी कैलाशानंद गिरि के अनुसार, सनातन धर्म में वर्ष के सभी 12 महीनों का अपना विशिष्ट धार्मिक और आध्यात्मिक महात्म्य है।

भिन्न-भिन्न मासों का संबंध विभिन्न देवी-देवताओं से जुड़ा हुआ है; जैसे पुरुषोत्तम मास भगवान श्री हरि नारायण को अत्यंत प्रिय है और मार्गशीर्ष मास भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय माना गया है। ठीक उसी प्रकार, श्रावण (सावन) मास भगवान भोलेनाथ को सर्वाधिक प्रिय है। यही कारण है कि सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक, गंगाजल अर्पण, बेलपत्र, धतूरा चढ़ाने तथा महामृत्युंजय मंत्र या पंचाक्षरी मंत्र (नमः शिवाय) के जप का अनंत गुना फल बताया गया है।

🏰 भगवान शिव का ससुराल माना जाता है कनखल, माता सती से जुड़ा है इसका पावन इतिहास

स्वामी कैलाशानंद गिरि जी ने हरिद्वार स्थित कनखल क्षेत्र के महान धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए बताया कि कनखल वस्तुतः भगवान शिव का ससुराल है।

पौराणिक इतिहास के अनुसार, जगज्जननी माता सती का संबंध इसी पावन भूमि (प्रजापति दक्ष का क्षेत्र) से रहा है। इसी कारण कनखल को महादेव और माता सती की पावन लीलाओं से जुड़ी पवित्र स्थली के रूप में देखा जाता है। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि सावन मास में कनखल में की गई शिव पूजा से साधक को त्वरित आध्यात्मिक लाभ और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

🌊 महाकवि कालिदास ने भी माना था कनखल की गंगा को सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र

स्वामी कैलाशानंद गिरि ने महाकवि कालिदास से जुड़े एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि सैकड़ों वर्ष पूर्व जब महाकवि कालिदास ने मां भगवती गंगा के विभिन्न तटों और क्षेत्रों का अवलोकन किया था, तब उन्होंने कनखल में प्रवाहित होने वाली गंगाधारा को सर्वाधिक पवित्र और श्रेष्ठ निरूपित किया था।

अतः कनखल का महत्व न केवल भगवान शिव के ससुराल के रूप में है, बल्कि मां गंगा का यह पावन प्रवाह भी इस क्षेत्र को अद्भुत दिव्य ऊर्जा प्रदान करता है।

❓ क्यों पड़ा इस पवित्र क्षेत्र का नाम ‘कनखल’? जानें इसके पीछे छिपा गूढ़ अर्थ

कनखल शब्द की उत्पत्ति के संदर्भ में भी कई धार्मिक और शाब्दिक मान्यताएं जनमानस में प्रचलित हैं।

स्वामी कैलाशानंद के अनुसार, ‘कनखल’ का अर्थ है—वह स्थान जहां किसी ‘खल’ अर्थात् दुष्ट, अधर्मी या दुराचारी व्यक्ति का वास संभव ही नहीं है। इसी पावन विशेषता के कारण इस दिव्य क्षेत्र को ‘कनखल’ नाम से प्रसिद्धि मिली। धार्मिक दृष्टि से कनखल एक अत्यंत जाग्रत और पवित्र क्षेत्र है, जहां महादेव और पतित पावनी मां गंगा की संयुक्त कृपा निरंतर बरसती है।

🏔️ सावन में कैलाश छोड़कर कनखल में वास करते हैं महादेव, शिव पुराण में मिलता है वर्णन

स्वामी कैलाशानंद गिरि ने ‘शिव पुराण’ और ‘स्कंद पुराण’ का आधिकारिक संदर्भ देते हुए एक दुर्लभ तथ्य उजागर किया।

उन्होंने बताया कि यद्यपि भगवान शिव का मुख्य स्थायी निवास कैलाश पर्वत माना गया है, किंतु सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव अपने एक सूक्ष्म दिव्य स्वरूप में हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में भी निवास करते हैं। यही कारण है कि सावन में कनखल में की गई साधना सीधे शिव चरणों में स्वीकार होती है। इसके अतिरिक्त, काशी विश्वनाथ, बैद्यनाथ धाम सहित समस्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों में भी सावन के दौरान महादेव की दिव्य उपस्थिति की मान्यता है।

🧘 सावन में शिव भक्ति क्यों है इतनी खास? आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का है सर्वोत्तम समय

स्वामी कैलाशानंद गिरि के अनुसार, सावन केवल एक परंपरा निभाने का महीना नहीं है, अपितु यह आत्मशुद्धि, संयम, योग और पूर्ण समर्पण का समय है।

इस अवधि में की गई निष्काम शिव आराधना भक्त के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश कर सकारात्मकता और दिव्य प्रकाश का संचार करती है। विशेष रूप से हरिद्वार और कनखल जैसे मोक्षदायी तीर्थों में सावन के समय शिव भक्ति का महत्व कोटि-कोटि गुना बढ़ जाता है।

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