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ISI का यसमैन रहा सैयद सलाहुद्दीन अब पाकिस्‍तान के लिए बन रहा बोझ, जानिए पूरी कहानी

श्रीनगर। कश्मीर में दशकों तक आतंक का चेहरा रहा हिजबुल मुजाहिदीन का स्वयंभू सुप्रीम कमांडर मोहम्मद युसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन अब शायद पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी के लिए एक बोझ बन गया है। कश्मीर में बड़े आतंकी कमांडरों के मारे जाने और पाकिस्तान के मंसूबों के अनुरूप वारदात को अंजाम देने में विफल रहने पर पाकिस्तानी एजेंसी उसे और झेलने को तैयार नहीं है।

अब शायद आइएसआइ के काम का नहीं रहा सलाहुद्दीन

कभी जेकेएलएफ जैसे आतंकी संगठनों को किनारे लगाने के लिए आइएसआइ ने पाक समर्थित हिजबुल मुजाहिदीन को आगे बढ़ाया था। सलाहुद्दीन ने भी उसके इशारे पर कश्मीर के अमन-चैन में आग लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिजबुल मुजाहिदीन भले ही सलाहुद्दीन पर हमले से इन्कार करे पर यह सत्य है कि अब वह आइएसआइ के किसी काम का नहीं रहा है।

 रावलपिंडी में हिजबुल सरगना पर हुए कथित हमले के असर को समझने के लिए पहले कश्मीर में सलाहुद्दीन के प्रभाव को जानना जरूरी है। इस घटनाक्रम का असर जम्मू-कश्मीर से लेकर इस्लामाबाद तक दिखेगा। यह जम्मू कश्मीर में आतंकवाद और पाकिस्तान की भूमिका के भविष्य को भी तय करेगा।

 कभी जेकेएलएफ को रोकने के लिए पाकिस्तान ने हिजबुल सरगना को बढ़ाया था आगे

श्रीनगर से करीब 20 किलोमीटर दूर बड़गाम के सोईबुग का निवासी सलाहुद्दीन तीन दशक से गुलाम कश्मीर में ठिकाना बनाए हुए है। ग्लोबल आतंकियों की सूची में शामिल इस स्वयंभू आतंकी कमांडर ने कश्मीर विश्वविद्यालय से 1971 में राजनीति शास्त्र में एमए की डिग्री प्राप्त की थी।

जमात के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में शामिल सलाहुद्दीन ने मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट कश्मीर के गठन में अहम भूमिका निभाई थी। श्रीनगर के बटमालू विधानसभा क्षेत्र से उसने 1987 में चुनाव भी लड़ा था। कश्मीर में चार प्रमुख आतंकी कमांडर यासीन मलिक, जावेद मीर, अश्फाक मजीद वानी और हमीद शेख उसके पोलिंग एजेंट रहे हैं। अश्फाक और हमीद मारे जा चुके हैं।

आइएसआइ के इशारे पर फैलाया आतंक

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने 1990 में गुलाम कश्मीर में भी आजादी के नारे को मजबूत बनाया तो आइएसआइ ने उसकी काट के तौर पर हिजबुल मुजाहिद्दीन को आगे बढ़ाया। हिजबुल भले ही कश्मीर की आजादी के नारे पर युवाओं को बरगलाता रहे, लेकिन उसका असली मकसद कश्मीर का पाकिस्तान में विलय है।

जमात उस दौरान पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के साथ हर स्तर पर संपर्क में थी और हिजबुल का लगभग 99 फीसद कैडर जमात की पृष्ठभूमि से है। सलाहुद्दीन ने हिजबुल को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। मास्टर अहसान डार के स्थान पर हिजबुल की कमान संभाली तो कश्मीर में आतंकी गुटों में मारकाट तेज हो गई। हिजबुल ने पाकिस्तान के इशारे पर उन आतंकी कमांडरों को मौत के घाट उतारा जो आइएसआइ के एजेंडे के खिलाफ थे।

अब आमिर खान संभालता है ऑपरेशनल गतिविधियां

कश्मीर पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक सलाहुद्दीन की स्थिति अब मजबूत नहीं रही है। बीते छह सालों में दक्षिण कश्मीर का आमिर खान गुलाम कश्मीर में हिजबुल की ऑपरेशनल गतिविधियों को देख रहा है। उन्होंने बताया कि उम्र सलाहुद्दीन के साथ नहीं है। वह करीब 72 साल का हो चुका है। जम्मू कश्मीर में आतंकियों की नई पौध अब गुलाम कश्मीर से आने वाले हर हुकम और आइएसआइ के मंसूबों को पूरा करने के बजाय वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद संग आगे बढ़ना चाहती है।

1991 में भाग गया था गुलाम कश्मीर

कट्टरपंथी सैय्यद अली शाह गिलानी का करीबी रहा सलाहुद्दीन 1991 में सुरक्षाबलों से बचने के लिए गुलाम कश्मीर भाग गया। इस बीच, यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के अध्यक्ष पद से आजम इंकलाबी ने इस्तीफा दे दिया। इंकलाबी के इस्तीफे पर सलाहुद्दीन को जिहाद काउंसिल का चेयरमैन बनाया गया, क्योंकि वह आइएसआइ का यसमैन था।

आइएसआइ के दबाव में वार्ता से हट गया था हिजबुल

करीब बीस साल पहले हिजबुल मुजाहिद्दीन ने जंगबंदी का एलान करते हुए केंद्र सरकार से वार्ता की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन आइएसआइ के दवाब में सलाहुद्दीन पीछे हट गया था। मजीद डार के नेतृत्व में बने गुट के ज्यादातर कमांडरों को सलाहुद्दीन समर्थकों ने कत्ल कर दिया।

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