ब्रेकिंग
Indore Holkar Stadium Match: टिकटों की किल्लत का फायदा उठा रहे साइबर फ्रॉड, पुलिस ने जारी किया बड़ा ... LPU Controversy: लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी बवाल पर पंजाब महिला आयोग सख्त, DC और SSP को भेजा नोटिस Congress Protest in MP: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भोपाल में कांग्रेस का हल्लाबोल, कार्यकर्ताओं और प... Jalalabad News: डीएवी हॉल्ट के पास ट्रेन के नीचे आकर युवक ने की खुदकुशी, चक मन्ने वाला निवासी लवप्री... Maur Mandi Suicide Case: पत्नी, ससुरालियों और पुलिसकर्मी से तंग आकर युवक ने लगाई फांसी, वीडियो बनाकर... अवैध हथियारों से पूरी तरह दूर रहें नागरिक: जालंधर के पुलिस कमिश्नर सतिंदर सिंह की सख्त चेतावनी Shahi Masjid Ujjain Update: इंदौर हाईकोर्ट में बनी सहमति, 9 फीट की जगह अब 3 फीट हिस्सा तोड़ेगा प्रबं... पठानकोट में शिवसेना नेता के भाई की संदिग्ध मौत: बेडरूम में मिले चोटों के निशान, परिजनों ने लगाया हत्... Ludhiana Dog Attack: डाबा में अमेरिकन बुली कुत्ते ने BCA छात्र पर किया जानलेवा हमला, दोनों मालिकों प... Indian Coast Guard Rescue MT Seagull 9: ओडिशा तट के पास समुद्र में फंसे विदेशी केमिकल टैंकर को बचाया...
छत्तीसगढ़

Bilaspur High Court Ruling: ट्रायल कोर्ट के जज द्वारा गवाह से सवाल पूछने पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, 5 साल की सजा खत्म

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्याय व्यवस्था और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा है कि ट्रायल कोर्ट यानी निचली अदालत का जज किसी भी गवाह से ऐसे सवाल नहीं पूछ सकता, जिससे अभियोजन पक्ष या सरकारी वकील का कमजोर पड़ रहा केस अचानक मजबूत हो जाए। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि एक जज का मुख्य दायित्व केवल सच का पता लगाना होता है, न कि किसी सरकारी वकील की भूमिका निभाना। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने दिनांक 24 सितंबर 2026 को प्रताप सिंह से जुड़े एक आपराधिक मामले में सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह पलट दिया और अपीलार्थी को 5 साल की सजा से बरी कर दिया।

🔍 क्या है पूरा मामला? 2011 के विवाद में निचली अदालत ने बेटे को सुनाई थी 5 साल की सजा

यह पूरा कानूनी विवाद नवंबर 2011 का है, जब छत्तीसगढ़ के पेंड्रा स्थित ग्राम डोंगरिया में उमराव सिंह और शिवनाथ के बीच किसी बात को लेकर आपसी झगड़ा हो गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोप यह था कि शिवनाथ और उसके बेटे प्रताप सिंह ने लाठी से हमला कर उमराव सिंह की हत्या कर दी। इस मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने पिता शिवनाथ को तो साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था, लेकिन उसके बेटे प्रताप सिंह को दोषी मानते हुए 5 साल की कठोर कारावास और 1 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुना दी थी। इसी सजा और फैसले के खिलाफ आरोपी प्रताप सिंह ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी।

⚠️ हाईकोर्ट ने पकड़ी सजा में खामियां: पुलिस की जब्ती और डॉक्टरों की गवाही भी नहीं कर पाई थी पुष्टि

मामले की गहराई से सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पाया कि इस पूरे केस में अभियोजन पक्ष की गवाही अपने ही पूर्व बयानों से पूरी तरह पलट चुकी थी। हालांकि पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट में घटना के दौरान लाठी जब्त किए जाने की बात लिखी थी, लेकिन अदालत में पेश किए गए गवाहों ने इस जब्ती को पूरी तरह से नकार दिया। इसके अलावा, मामले के चिकित्सीय परीक्षण यानी डॉक्टर ने भी अपनी गवाही में यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं किया था कि मृतक को आई चोटें वास्तव में केवल लाठी से ही लगी थीं। सबसे गंभीर बात यह थी कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के जज ने खुद गवाहों से ऐसे आक्रामक और तीखे सवाल किए, जिससे गवाह आरोपी के खिलाफ बयान देने के लिए मानसिक रूप से मजबूर नजर आए।

🏛️ ‘एक जैसे सबूतों पर दो अलग फैसले नहीं हो सकते’, हाईकोर्ट ने दिए निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत

इस पूरे मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि एक जज कानून के दायरे में रहकर सच को खोज सकता है, लेकिन वह किसी भी स्थिति में सरकारी वकील की कुर्सी नहीं संभाल सकता। जज ऐसे सवाल नहीं पूछ सकता जो किसी गवाह को मानसिक रूप से डराएं या उसे किसी एक ही विशेष उत्तर की तरफ धकेलने के लिए बाध्य करें। अदालत ने मुख्य तार्किक सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक जैसे और समान सबूतों के आधार पर सह-आरोपी शिवनाथ को ट्रायल कोर्ट ने पहले ही बरी कर दिया था, तो ठीक उन्हीं समान सबूतों के आधार पर दूसरे आरोपी यानी प्रताप सिंह को दोषी मानकर सजा कैसे दी जा सकती है? कानून की नजर में एक जैसे मामलों में दोनों के साथ एक जैसा ही कानूनी बर्ताव होना चाहिए था।

🚫 सरकारी वकील नहीं साबित कर पाए आरोप, हाईकोर्ट ने प्रताप सिंह की सजा को किया पूरी तरह रद्द

इस संपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया में सरकारी पक्ष और वकील प्रताप सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत में संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल निचली अदालत के जज द्वारा खुद पूछे गए सवालों के बयानों और जवाबों के आधार पर किसी भी नागरिक को सजा नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर न्यायहित में कदम उठाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 5 साल की सजा के फैसले को पूरी तरह से रद्द कर दिया और आरोपी प्रताप सिंह को सभी आरोपों से सम्मानजनक रूप से बरी कर दिया है।

Related Articles

Back to top button