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देवेंद्र को मिलेगा उद्धव का साथ, राजनीति के पुरोधा शरद पवार आज भी धोबीपछाड़ को तैयार

महाराष्ट्र में मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। परिणामों का इंतजार हो रहा है। 24 अक्टूबर को दोपहर बाद तक स्थिति साफ हो जाएगी कि सत्ता का ताज किसके सिर रखा जाना है। ऐसे में कुछ पुरानी घटनाएं और गोस्वामी तुलसीदास की एक चौपाई याद आने लगी है। घटनाओं का जिक्र बाद में करते हैं। पहले चौपाई याद कर लेते हैं। चौपाई है- ‘जहां सुमति तहं संपति नाना। जहां कुमति तहं विपति निधाना।।’ तुलसी बाबा ने यह चौपाई सुंदरकांड में किसी संदर्भ में कही है, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि जहां लोग सुमति यानी अच्छी बुद्धि से रहते हैं वहां हर प्रकार की सुख-समृद्धि आती है। और जहां कुमति का वास होता है वहां विपत्तियां ही विपत्तियां आती हैं।

जब बालासाहब ने मनोहर जोशी को सीएम पद से हटा राणे को सत्ता सौंपी 

महाराष्ट्र का 1999 का विधानसभा चुनाव शिवसेना-भाजपा गठबंधन द्वारा लगभग पांच वर्ष की सत्ता भोगने के बाद आया था। उस सत्ता के शुरुआती चार वर्ष तक शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री एवं भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री थे। उस समय सीटों का समझौता करते हुए यही तय भी हुआ था कि गठबंधन में जिसकी सीटें अधिक होंगी, उसका मुख्यमंत्री बनेगा और जिसकी कम होंगी उसका उपमुख्यमंत्री होगा। यही समझौता 1999 के बाद भी चलना था, लेकिन चुनाव आने से छह माह पहले ही शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे ने मनोहर जोशी को मुख्यमंत्री पद से हटा नारायण राणे को सत्ता सौंप दी थी। उस समय शिवसेना 171 और भाजपा 117 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। भाजपा जानती थी कि शिवसेना से इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़कर वह उससे अधिक सीटें नहीं ला सकेगी। इसलिए मुंडे के मुख्यमंत्री बनने का अवसर कभी नहीं आएगा।

शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का किया था गठन

भाजपा दोनों पार्टियों के ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनाने का नया फॉर्मूला अपनाना चाहती थी। शिवसेना तैयार नहीं थी। चुनाव परिणाम आए तो शिवसेना को पिछले चुनाव से चार सीटें कम यानी 69 व भाजपा को पिछले चुनाव से नौ सीटें कम यानी 56 सीटें मिली थीं। दोनों को मिला 125 सीटें हो रही थीं जो सरकार बनाने की जादुई संख्या से 20 कम थीं। दूसरी ओर कांग्रेस और राकांपा, दोनों वह चुनाव अलग-अलग लड़े थे। वास्तव में कुछ माह पहले ही शरद पवार ने सोनिया गांधी केविदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया था। दोनों दलों में कटुता भी चरम पर थी।

15 साल तक महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा की ही सत्ता रही

चुनाव में तितर-बितर हो चुकी कांग्रेस ने 75 सीटें एवं नई बनी राकांपा ने 58 सीटें जीती थीं। कोई उम्मीद नहीं थी कि दोनों दल साथ आकर सरकार बनाने की बात भी करेंगे। कांग्रेस, राकांपा, एवं शिवसेना-भाजपा गठबंधन को छोड़कर 30 सदस्य अन्य छोटे दलों के या निर्दलीय जीतकर आए थे। इनमें आठ-दस ऐसे थे जो वैचारिक कारणों से किसी कीमत पर शिवसेना-भाजपा के साथ नहीं आ सकते थे, लेकिन 20-22 को अपने साथ लाने की बात तब शिवसेना की कमान संभाल रहे नारायण राणे करते आ रहे थे। किंतु गोपीनाथ मुंडे कम से कम ढाई साल के मुख्यमंत्री पद का आश्वासन मिले बिना आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे। भाजपा-शिवसेना के बीच ‘कुमति’ का यह नाटक पूरे 11 दिन चलता रहा और 18 अक्टूबर 1999 को कांग्रेस के विलासराव देशमुख ने मुख्यमंत्री और राकांपा के छगन भुजबल को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर मंत्रालय में जो विराजमान हुए तो अगले 15 साल तक महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा की ही सत्ता रही। दूसरी ओर भाजपा को ये अवधि बगैर सत्ता के हाथ मलते ही गुजारनी पड़ी।

जब शरद पवार ने ‘सुमति’ से काम लेते हुए सीएम पद कांग्रेस को सौंपा 

अब आते हैं 2004 के विधानसभा चुनाव पर। उस बार शिवसेना को 62, भाजपा को 54, कांग्रेस को 69 और शरद पवार की राकांपा को 71 सीटें प्राप्त हुईं यानी उस बार सबसे बड़ी पार्टी थी शरद पवार की राकांपा। कांग्रेसराकांपा में भी गठबंधन की शर्तों के अनुसार मुख्यमंत्री उसी का बनना था, जिसकी सीटें ज्यादा थीं। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार पूरी तरह मुख्यमंत्री पद के लिए कमर कसे बैठे थे। दूसरी ओर कांग्रेस भी मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थी। चुनाव सुशील कुमार शिंदे के नेतृत्व में लड़ा गया था, लेकिन कांग्रेस मराठावाद की राजनीति के कारण उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहती थी। शरद पवार चाहते तो कांग्रेस की अंदरूनी कलह और खुद को मिली अधिक सीटों का लाभ लेते हुए मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोक सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने ‘सुमति’ से काम लेते हुए मुख्यमंत्री पद कांग्रेस को सौंप दिया। सत्ता फिर पांच साल के लिए कांग्रेस-राकांपा के हाथों में आ गई।

फडणवीस एवं उद्धव को लेना होगा सुमति से काम 

वर्ष 2014 में गठबंधन तोड़ने के बाद भाजपा-शिवसेना एक बार फिर गठबंधन कर चुनाव लड़े हैं। इस बार माहौल भी इस गठबंधन के पक्ष में दिखाई दे रहा है, लेकिन शिवसेना के मन में बड़े भाई का रुतबा छोड़ने की कसक और मंत्रालय पर शिवसेना का भगवा फहराने की लालसा बाकी है। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे इसे कई बार सार्वजनिक रूप से प्रकट भी कर चुके हैं। अब तो उनके चिरंजीव आदित्य ठाकरे स्वयं सत्ता संभालने को तैयार हैं। दूसरी ओर अब शिवसेना को अधिक सीटें देकर स्वयं कम सीटों पर लड़ने को राजी हो जानेवाली मुंडे-महाजन की भाजपा भी नहीं रही। ऐसे में परिणाम आने के बाद देवेंद्र फडणवीस एवं उद्धव ठाकरे को ज्यादा सुमति से काम लेना होगा। वरना दूसरी ओर महाराष्ट्र के बूढ़े शेर शरद पवार आज भी इन्हें धोबीपछाड़ देने को तैयार बैठे हैं।

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