खाली कटोरा हाथ में लिए क्लासरूम में झांकती थी भूखी बच्ची, तस्वीर वायरल होते ही बदल गई जिंदगी

नई दिल्ली: 5 वर्षीय मोती दिव्या आमतौर पर हैदराबाद में एक सरकारी स्कूल में कक्षा के बाहर खड़ी रहती और विद्याॢथयों को मिड-डे मील खाते झांकती थी। एक कचरा बीनने वाले की बेटी बड़ी सहनशीलता के साथ बच्चों द्वारा भोजन समाप्त करने की प्रतीक्षा करती थी। उसके हाथ में हमेशा एक कटोरा होता था। यदि वह भाग्यशाली होती तो कुछ न कुछ बच जाता, जिसे वह अपने घर पर ले जाती।
मगर ऐसा कुछ दिन पहले तक ही रहा। आज दिव्या उसी कक्षा में नीली कमीज तथा स्कर्ट पहन कर विद्याॢथयों के साथ बैठती है, जिसमें कभी वह छिप कर चुपके से झांका करती थी। उसके बहुत से मित्र बन चुके हैं।इस नन्ही बच्ची के जीवन के घटनाक्रमों में तब अप्रत्याशित मोड़ आया जब एक स्थानीय रिपोर्टर ने हैदराबाद के गुडीमलकापुर स्थित देवल झाम सिंह सरकारी उच्च विद्यालय में कक्षा के बाहर भोजन की प्रतीक्षा में झांकते उसका चित्र खींच लिया। वह चित्र एक स्थानीय रोजाना समाचारपत्र में प्रकाशित होने के साथ-साथ ऑनलाइन भी शेयर किया गया जिसने बहुत से लोगों के दिल को पसीज दिया। उनमें से एक थे बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले शहर के गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) एम.वी. फाऊंडेशन (एम.वी.एफ.) के संयोजक आर. वेंकट रेड्डी।
एन.जी.ओ. शीघ्र ही स्कूल के करीब ही एक झोंपड़ पट्टी में लड़की के परिवार का पता लगाने तथा बच्ची को स्कूल में दाखिला दिलवाने में सफल रहा। एन.जी.ओ. की समन्वयक नागलक्ष्मी ने बताया कि स्कूल में दाखिला लिए उसे लगभग एक महीना होने को है। दिव्या को अपने शिक्षा के अधिकार का पालन करते देखना दिल को बहुत सुकून देता है। वह बहुत तेजी से इसके अनुकूल हो रही है और उसके बहुत से मित्र बन चुके हैं। दिव्या के पिता एम. लक्ष्मण ने बताया कि उन्हें भी अब राहत महसूस होती है कि दिव्या स्कूल जा रही है तथा उन्हें अब उसकी सुरक्षा बारे चिंता करने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने बताया कि दिव्या की मां घरेलू नौकरानी के तौर पर काम करती है जिस कारण आमतौर पर दिव्या घर में अकेली रह जाती थी, जिससे वे ङ्क्षचतित रहते थे। मगर अब वे उसे वर्दी पहनकर प्रतिदिन स्कूल जाते देखकर बहुत खुश हैं। एम.वी.एफ. के अनुसार दिव्या जैसे बहुत से अन्य बच्चे हैं जिनके लिए शिक्षा प्राप्त करना एक दूर का सपना बना हुआ है। नागलक्ष्मी ने बताया कि दिव्या का चित्र बहुत से ऐसे बच्चों की दुर्दशा को बयां करता है जिनकी शिक्षा तक पहुंच नहीं है। दिव्या के साथ वे 4 से 7 वर्ष की आयु तक के 11 बच्चों को उसी स्कूल में दाखिला दिलाने में सफल रहे हैं।






