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छत्तीसगढ़

किसानों की बात सुनने को न सरकार तैयार, न राज्यपाल, संयुक्त किसान मोर्चा का आरोप

रायपुर: छत्तीसगढ़ के किसानों की समस्याओं को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा का गुस्सा फूट पड़ा. मुख्यमंत्री और राज्यपाल से मुलाकात का समय न मिलने के बाद किसान प्रतिनिधिमंडल सोमवार को राजभवन पहुंचा और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा. किसान नेताओं ने सरकार पर किसान विरोधी रवैये का आरोप लगाते हुए कहा कि अब लोकतंत्र नहीं, फासीवाद का शासन चल रहा है.

राज्यपाल और मुख्यमंत्री से न मिलने पर किसान संगठनों में आक्रोश: संयुक्त किसान मोर्चा और भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के पदाधिकारी ने कहा कि किसानों की हालत लगातार बिगड़ रही है. न राज्यपाल मिलने को तैयार हैं, न मुख्यमंत्री. नेताओं का आरोप है कि अधिकारी भी असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए हैं. किसान संगठनों ने कहा कि अब तो धरना-प्रदर्शन जैसे लोकतांत्रिक अधिकार भी छीन लिए गए हैं. दो महीने के लिए धरना स्थलों पर रोक किसानों के बीच गहरा असंतोष पैदा कर रही है.

“धान खेत में सड़ रहा है, सरकार को कोई परवाह नहीं”: छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष जनक लाल ठाकुर ने कहा “सरकार किसानों को सुनने को तैयार नहीं है. धान खरीदने को भी सरकार तैयार नहीं. पिछले साल का धान गोदामों में सड़ रहा है, ट्रांसपोर्ट नहीं हो पा रहा. सरकार चाहती है कि किसान का धान खेत में ही झड़ जाए.” उन्होंने आरोप लगाया कि यह सरकार किसान हितैषी नहीं, व्यापारी हितैषी है. ठाकुर ने राज्यपाल पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पहले राज्यपाल जनता से मिलते थे, अब अधिकारी आवेदन लो या जाओ कहकर भगा देते हैं.

“बिजली बिल, रजिस्ट्री, पोर्टल — हर तरफ किसान परेशान”: भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रदेश महासचिव तेजराम विद्रोही ने कहा “किसानों पर एक साथ कई संकट हैं. बेमौसम बारिश से फसलें चौपट हो गईं, एग्रीस्टेक पोर्टल में दिक्कतें हैं, बिजली बिल बढ़े हुए हैं, और जमीन की ऑनलाइन रजिस्ट्री की प्रक्रिया बेहद कठिन है. 27 अक्टूबर को राज्यपाल से मिलने का आवेदन दिया गया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मुख्यमंत्री के अधिकारियों को फोन करते हैं तो वे जवाब नहीं देते, व्हाट्सएप पर सिर्फ ‘हाथ जोड़ने वाला इमोजी’ भेज देते हैं. यही भाजपा सरकार का किसान प्रेम है.”

“यह लोकतंत्र नहीं, फासीवादी शासन है”: आदिवासी भारत महासभा के संयोजक सौरभ यादव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र नहीं बचा है. धरना स्थल तूता को दो महीने के लिए बंद कर दिया गया है. अब कोई भी छोटा प्रदर्शन भी नहीं कर सकता. एक ओर सरकार माओवादियों से कहती है कि लोकतांत्रिक रास्ता अपनाओ, लेकिन जब जनता लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाती है तो उसे रोका जाता है.” उन्होंने सवाल उठाया कि अगर माओवादी सरेंडर कर रहे हैं, तो क्या पैरामिलिट्री फोर्स भी वापस जाएगी? जल, जंगल और खनिज की लूट रोकने पर क्या बात होगी?

“किसानों की जमीन छीनने की तैयारी”: छत्तीसगढ़ किसान महासभा के संयोजक नरोत्तम शर्मा ने कहा कि सरकार डिजीटल पोर्टल के माध्यम से किसानों की जमीन छीनने की योजना बना रही है. रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गई है कि किसान त्रस्त हैं.

कांग्रेस का हमला — “सरकार किसानों के प्रति उदासीन”: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष धनेन्द्र साहू ने कहा “मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों ही किसानों से मिलना नहीं चाहते. यह सरकार किसानों की समस्या को लेकर पूरी तरह लापरवाह है. कर्मचारी हड़ताल के कारण टोकन जारी नहीं हो पा रहे, पंजीयन रुका हुआ है, किसान दर-दर भटक रहे हैं.” उन्होंने कहा कि किसान आज दंडात्मक रवैये और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच सबसे कमजोर स्थिति में हैं.

“सारे वादे पूरे किए, कांग्रेस कर रही राजनीति”: भाजपा प्रदेश प्रवक्ता डॉ. विजय शंकर मिश्रा ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया।“भाजपा सरकार ने किसानों से किए सभी वादे पूरे किए हैं। कांग्रेस मुद्दों का राजनीतिकरण कर रही है। किसानों के पंजीयन की संख्या भी इस बार ज्यादा हुई है।”उन्होंने कहा कि बेमौसम बारिश के कारण धान खरीदी की तारीख बढ़ाई गई है, ताकि किसानों को राहत मिल सके।“कांग्रेस को बस विवाद खड़ा करना है, जबकि जमीन पर किसानों की कोई समस्या नहीं है.

किसानों का कहना है कि उनकी आवाज न सरकार सुन रही है, न राजभवन. वहीं सरकार का तर्क है कि विपक्ष सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए माहौल बना रहा है. इन आरोपों और जवाबों के बीच सवाल वहीं है. क्या छत्तीसगढ़ का अन्नदाता अब भी सरकार के दरबार तक अपनी बात पहुंचा पाएगा?

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