ग्लोबल प्लेयर बना भारत: 2025 में रिफॉर्म्स की रफ़्तार और डिप्लोमेसी की धार ने दुनिया को चौंकाया

2025 भारत के शासन के लिहाज से और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक निर्णायक मोड़ साबित होगा. अर्थव्यवस्था से लेकर राष्ट्रीय व आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सुधारों से लेकर वैश्विक कूटनीति तक, यह वर्ष नीति, दिशा और प्रभाव के स्तर पर कई बड़े बदलावों का गवाह बनेगा.
ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन के CEO और MyGov में पूर्व डायरेक्टर अखिलेश मिश्रा ने 2025 विशेष रेट्रोस्पेक्टिव सीरीज के तहत विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखें. आइए उनके ही शब्दों में जानें National Security & Civilisational Assertion को लेकर उनके क्या विचार हैं-
दशकों तक भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को एक कूटनीतिक समस्या की तरह ट्रीट किया, जिसे संवाद, संयम और संतुलन से मैनेज किया जा सकता है. 2025 में भारत ने वह स्पष्ट बात स्वीकार की, जिसे हर संप्रभु राष्ट्र सहज रूप से समझता है: राष्ट्रीय सुरक्षा संसाधनों से नहीं, इच्छाशक्ति से तय होती है. 2025 वह मोड़ होगा, जब भारत ने खतरों को संभालने की नीति छोड़कर उन्हें निर्णायक रूप से समाप्त करने का रास्ता चुना.
बाहरी सुरक्षा: डोजियर से सिद्धांत तक
1. ऑपरेशन सिंदूर: रणनीतिक उलझन का अंत
2014 से पहले भारत ने आतंकवाद का जवाब एक तयशुदा ढर्रे पर दिया- डोजियर, बातचीत और इनकार. उस समय आतंकी हमलों के बाद दुनिया की अंतरात्मा को झकझोरा जाता था, जबकि गुनहगार भारत के संयम को उसकी कमजोरी समझते रहे, लेकिन 2014 के बाद परिदृश्य बदल गया.
बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक ने साफ संदेश दिया कि आतंक और उसको संरक्षण देने वाले आकाओं को इसकी कीमत चुकानी होगी, लेकिन 2025 ने इस नियम को भी पीछे छोड़ दिया.
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की. यह कार्रवाई केवल आतंकी शिविरों तक सीमित नहीं रही, पाकिस्तान के भीतर मौजूद आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर और सैन्य ठिकानों तक संदेश पहुंचा दिया गया. यह प्रतिशोध नहीं था. यह एक सिद्धांत था कि भारत अब हमलों के बाद प्रतिक्रिया नहीं देता, वह खतरे की जड़ों को समाप्त करने की नीति पर चलता है.
2. न्यू नॉर्मल डॉक्ट्रिन: तीन रेड लाइन, कोई फुटनोट नहीं
ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस सच्चाई को औपचारिक रूप से घोषित किया, जो अब तक केवल व्यवहार में दिखती थी:
- आतंकी हमला युद्ध की कार्रवाई है.
- न्यूक्लियर ब्लैकमेल भारत की प्रतिक्रिया को सीमित नहीं कर सकता.
- आतंकी, उनके हैंडलर और उन्हें संरक्षण देने वाले राष्ट्र—तीनों में कोई अंतर नहीं है.
यह कांग्रेस की उस विरासत से बिल्कुल अलग था, जिसमें बिना बदले के रोक-टोक की बात कही जाती थी, जिसकी कीमत भारत ने दशकों तक लहूलुहान होकर चुकाई. भारत अब पैसिव स्टेट नहीं है. भारत अब दंड देने वाला संप्रभु राष्ट्र है.
3. सिंधु जल संधि का सस्पेंशन: गैर-जरूरी उदारता का अंत
दशकों तक भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि का पालन किया. उस समय भी, जब पाकिस्तान सीमापार युद्ध और प्रायोजित आतंक को नीति के औजार की तरह इस्तेमाल करता रहा. यह एक असहज विरोधाभास था: हिंसा उधर, उदारता इधर.
2025 में यह विरोधाभास समाप्त हुआ. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को सस्पेंड कर स्पष्ट कर दिया कि रणनीतिक उदारता और प्रायोजित हिंसा एक साथ नहीं चल सकतीं. खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते—यह कोई भावनात्मक नारा नहीं था. यह देर से आई, लेकिन स्पष्ट नीतिगत रेखा थी. आंतरिक सुरक्षा: उग्रवाद को खत्म करना है, उसे मैनेज करना नहीं.
4. रेड कॉरिडोर का अंत: माओवाद की हार
UPA शासन के दौरान नक्सलवाद को एक सोशियोइकोनॉमिक समस्या कहकर सामान्यीकृत किया गया था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैसा ही पहचाना जैसा यह था यानी इसे भारत के संवैधानिक ढांचे को गिराने के उद्देश्य से चल रही सशस्त्र बगावत माना जा गया.
और 2025 तक तस्वीर बदल चुकी है. नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर लगभग 11रह गयी है, जबकि UPA के शासनकाल में यह 182 तक पहुंच चुकी थी. इसके साथ ही नक्सली हिंसा ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. यह मार्च 2026 तक नक्सल-फ्री इंडिया बनाने का टारगेट रखा गया है.
यह बदलाव भाषणों से नहीं आया. यह आया लगातार दबाव से आया. सख्त सुरक्षा कार्रवाई को विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और आदिवासी समुदायों तक सीधी पहुंच के साथ जोड़ा गया और बगावत समाप्त नहीं हुई है, बल्कि इसे समाप्त कर दिया गया है.
5 . माओवादियों के कमांड स्ट्रक्चर का अंत
2025 वह वर्ष था, जब माओवादी आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी गई. शीर्ष कमांडरों और पोलित ब्यूरो से जुड़े प्रमुख चेहरों को या तो निष्क्रिय कर दिया गया या पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. बसवराजू, हिडमा और ऐसे कई नाम, जो कभी दंड से मुक्ति के प्रतीक माने जाते थे, अब इतिहास बन चुके हैं. सैकड़ों कैडर न्यूट्रिलाइज्ड किए गये.
हजारों ने आत्मसमर्पण किया या गिरफ्तार हुए. यह कोई संयोग नहीं था. यह हथियारबंद नक्सलियों के साथ-साथ अर्बन नक्सलियों के एक इकोसिस्टम को सिस्टमैटिक तरीके से खत्म करना था.
6. डिफेंस प्रोडक्शन: डिपेंडेंसी से डिटरेंस तक
2014 में भारत की रक्षा तैयारी एक बुनियादी कमजोरी से जूझ रही थी. अधिकांश डिफेंस हार्डवेयर आयात पर निर्भर था. हथियार खरीदे जाते थे, क्षमता नहीं बनती थी.
2025 तक यह तस्वीर निर्णायक रूप से बदल चुकी है. डिफेंस प्रोडक्शन 1.54 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच चुकी है. 2014 से स्वदेशी रक्षा उत्पादन में 174 फीसदी की वृद्धि हुई है. डिफेंस एक्सपोर्ट 23,600 करोड़ रुपए के पार हो गया है.
यह केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है. यह रणनीतिक स्वतंत्रता का मापन है. डिफेंस में आत्मनिर्भरता अब कोई नारा नहीं है, यह डिटरेंस क्रेडिबिलिटी बन चुकी है, जिसे गिना, तौला और वैश्विक बाजार में स्वीकार किया जा सकता है.
7. प्रोक्योरमेंट रिफॉर्म और सुदर्शन चक्र मिशन
डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 ने उस प्रणालीगत जड़ता को तोड़ा, जिसने दशकों तक भारत की रक्षा तैयारियों को अस्पष्टता, देरी और चयनात्मक पक्षपात में जकड़े रखा था. खरीद प्रक्रियाएं सरल हुईं, निर्णय-श्रृंखला स्पष्ट हुई और स्वदेशी उद्योग को नीति के केंद्र में लाया गया.
इसी के समानांतर, सुदर्शन चक्र मिशन ने भारत की अगली पीढ़ी की स्वदेशी स्ट्राइक और डिफेंस क्षमताओं की दिशा तय की. इस साल भारत ने खरीदार से बिल्डर तक, कमजोरी से विश्वसनीयता तक का सफर तय किया.
8. नागरिकता संशोधन एक्ट: सभ्यता की झिझक का अंत
यूपीए शासन के दौरान सबको साथ लेकर चलने की भाषा तो खूब गूंजी, लेकिन वे लोग, जो अपने धर्म के कारण प्रताड़ित थे और जिनकी सभ्यतागत जड़ें भारत में थीं, देशविहीन ही बने रहे.
2024-25 में CAA के प्रभावी क्रियान्वयन और उसके बाद कट-ऑफ डेट को दिसंबर 2024 तक बढ़ाने के निर्णय ने इस ऐतिहासिक अन्याय को संबोधित किया. धर्म के आधार पर सताए गए अल्पसंख्यकों को केवल शरण नहीं, सम्मान और कानूनी पहचान मिली. यह सभ्यता की जिम्मेदारी थी, जिसे अंततः स्वीकार किया गया.
2025 का राष्ट्रीय सुरक्षा अनुभव एक बड़ा सबक भी देता है, टकराव नहीं बढ़ा, कन्फ्यूजन खत्म हुआ. और जब कन्फ्यूजन समाप्त हो जाता है, तो रोकथाम अपने आप शुरू हो जाती है.






