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छत्तीसगढ़

सरगुजा की बेटी सुष्मिता ने राष्ट्रीय गतका में जीता ब्रॉन्ज मेडल, पिता की मौत के बाद मां ने मजदूरी कर आगे बढ़ाया

सरगुजा: जिले के आदिवासी बच्चे अपने हौसले और मेहनत के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन कर रहे हैं. अंचल है. बेहतर खेल सुविधाओं के अभाव और बिना पर्सनल कोच के भी यहां के खिलाड़ी शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं. ऐसी ही एक लड़की है सुष्मिता जिसने गतका चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता है.

चंडीगढ़ में हुई राष्ट्रीय गतका चैंपियनशिप: 9वीं सीनियर राष्ट्रीय गतका चैंपियनशिप का आयोजन 28 से 30 दिसंबर 2025 तक चंडीगढ़ में किया गया. इस प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ प्रदेश की टीम से सरगुजा जिले के दो खिलाड़ियों का चयन हुआ था.

सुष्मिता चौहान ने बढ़ाया प्रदेश का मान: सरगुजा जिले की सुष्मिता चौहान ने बालिका सीनियर वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया. उनके इस प्रदर्शन से न केवल सरगुजा बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश का नाम रोशन हुआ है.

पिता नहीं, मां ने मजदूरी कर बढ़ाया: सुष्मिता बेहद गरीब परिवार से आती हैं. उनके पिता मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण करते थे, लेकिन 2018 में बीमारी के कारण उनका निधन हो गया. इसके बाद से उनकी मां मजदूरी करके पूरे परिवार को संभाल रही हैं. परिवार में पांच भाई और पांच बहनें हैं. इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद सुष्मिता ने खेल को नहीं छोड़ा.

कोच ने की सुष्मिता की मेहनत की सराहना: राष्ट्रीय कोच राजेश प्रताप सिंह ने बताया कि सुष्मिता और शिवरतन का चयन उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन के आधार पर किया गया था. उन्होंने कहा कि सुष्मिता बेहद मेहनती है और कठिन हालातों के बावजूद उसने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर परिवार और प्रदेश को गौरवान्वित किया है.

गांधी स्टेडियम में होता है अभ्यास: सरगुजा गतका कोऑर्डिनेटर रजत सिंह ने बताया कि गांधी स्टेडियम स्थित बास्केटबॉल ग्राउंड में नियमित रूप से गतका का अभ्यास कराया जाता है. यहां से लगातार खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं. आगे चलकर ऐसे खिलाड़ियों को खेलो इंडिया जैसे बड़े आयोजनों में मौका मिल सकता है.

सुष्मिता का सपना, खेल से सरकारी नौकरी: सुष्मिता चौहान ने बताया कि उन्होंने पहले भी पंजाब और दुर्ग में ओपन नेशनल और स्टेट प्रतियोगिताएं खेली हैं. उन्होंने कहा कि घर की आर्थिक स्थिति कमजोर है, लेकिन मां की मेहनत और कोचों के सहयोग से वह आगे बढ़ रही हैं. सुष्मिता का सपना है कि उन्हें खेल के माध्यम से सरकारी नौकरी मिले ताकि वे अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकें.

मैंने पहले भी पंजाब में ओपन नेशनल खेला है और अभी दुर्ग में ओपन स्टेट खेली थी. ओपन स्टेट में ब्रॉन्ज ही लगा था. हम पांच भाई, पांच बहन हैं. आर्थिक तंगी महसूस होती है, मेरे घर में पापा नहीं है, मम्मी है. पापा 2018 में गुजर गए. मम्मी मजदूरी करती है उसी से जो घर चलता है. मैं स्पोर्ट से नौकरी करना चाहती हूं– सुष्मिता

मजदूरी करके इतने बड़े परिवार का पालन-पोषण करना आसान नहीं है. इसके बावजूद सुष्मिता जैसी बेटियां अपने संघर्ष और मेहनत से आगे बढ़ रही हैं. ऐसे खिलाड़ी न केवल अपने परिवार बल्कि अपने जिले और प्रदेश के लिए भी उम्मीद की किरण हैं.

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