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मध्यप्रदेश

अब 48 घंटे में सामने आएगी शरीर की ‘पूरी कुंडली’: जीनोम सीक्वेंसिंग पर हुई बड़ी रिसर्च, गंभीर बीमारियों का पहले ही चलेगा पता!

सागर: एक समय था जब किसी जीव, वनस्पति या बैक्टीरिया की जीनोम सीक्वेंसिंग में सालों लग जाते थे. तब जाकर संबंधित जीव या वनस्पति के शरीर से जुड़ी तमाम तरह अनुवांशिक जानकारी जुटा सकते थे. जो रिसर्च, बीमारियों के इलाज और कई तरह के अध्ययन में कारगर थी. लेकिन जीनोम सीक्वेंसिंग में लगने वाले समय के कारण रिसर्च या बीमारी का पता लगाने में सालों लग जाते थे. अब ऐसी तकनीक और मशीनरी तैयार कर ली गयी है, जो सालों में होने वाली जीन सीक्वेंसिंग को महज 48 घंटे में कर देता है.

इस तकनीक से मेडिकल साइंस में तो मानो क्रांति आ गयी है. किसी भी बीमारी या रोगजनित वायरस की महज दो दिन में पूरी कुंडली निकाल सकते हैं. इसके अलावा कृषि, पर्यावरण, वानिकी जैसे अन्य क्षेत्र में नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग से क्रांति आई है. सागर यूनिवर्सिटी के बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग पर प्रशिक्षण और शोध कार्य किया जा रहा है.

क्या है जीनोम सीक्वेंसिंग

जीनोम सीक्वेंसिंग (Genome Sequencing) लैब टैक्नालाॅजी है. जिसके माध्यम से किसी जीव, वनस्पति या बैक्टीरिया के DNA में मौजूद आनुवंशिक जानकारी का पता लगाती है. इस टैक्नालाॅजी के जरिए मिलने वाले जेनेटिक स्ट्रक्चर से बीमारियों की पहचान, वायरस के अलग-अलग वेरिएंट्स का पता लगाकर अनुवांशिक बीमारियों का पता भी लगा सकते हैं. जिससे रोगों का इलाज तलाशा जाता है.

जीनोम सीक्वेंसिंग से डीएनए के निर्देशों का अध्ययन कर उनको समझा जाता है. इस प्रक्रिया में DNA के के अनुक्रम को निर्धारित करने उन्नत मशीनों का उपयोग किया जाता है. इसका उपयोग स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर हो रहा है. खासकर कैंसर और दूसरी दुर्लभ अनुवंशिक बीमारियों के निदान में ये तकनीक काफी मददगार है. इसके अलावा महामारियों के नियंत्रण के साथ वानिकी, पर्यावरण और कृषि क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है.

मानव और चावल के जीनोम सीक्वेंसिंग में लगे थे सालों
जानकारों की मानें तो आज जीनोम सीक्वेसिंग में नेक्स्ट जनरेशन टैक्नालाॅजी आ गयी है. लेकिन एक दौर ऐसा भी था कि मानव जीनोम सीक्वेसिंग में 20 साल का वक्त लगा था और चावन के जीनोम सीक्वेंसिंग में 13 साल लगे थे. ऐसे में बीमारियों से जुडे़ अध्ययम और शोध में काफी वक्त लगता था. अब नई तकनीक के कारण ये सिर्फ दो दिन में हो सकता है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
सागर यूनिवर्सटी के बाॅयोटेक्नालॉजी विभाग के असि. प्रोफेसर डाॅ. सी पी उपाध्याय बताते हैं कि, ”किसी भी जीव, वनस्पति या बैक्टीरिया में जो डीएनए और आरएनए होते हैं. उसी से जीवन से संबंधित सारी तरह की जानकारी मिलती है. जिनमें प्रोटीन, हार्मोन और अनुवांशिकी से संबंधित तमाम जानकारियां मिल जाती है.

किसी भी जीव या वनस्पति में कोई बीमारी या उससे संबंधित दूसरी जानकारी पता लगाना है, तो जीनोम सीक्वेंसिंग से पता लगायी जा सकती है. पहले एक बार में एक जीन की सीक्वेसिंग होती थी, लेकिन अब नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेसिंग तकनीक से एक साथ कई जीन की सीक्वेसिंग हो सकती है. पहले सालों का वक्त लग जाता था, अब सिर्फ 48 घंटे इंतजार करना होता है.

2 दिन में मिल जाएगी सही जानकारी
नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग के विशेषज्ञ प्रवीण दौलत नलवे बताते हैं कि, ”इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि पहले हमें ट्रेन से 200-300 किमी का सफर तय करने में 10 घंटे तक लग जाते थे. लेकिन अब ये सफर दो से तीन घंटे में हो जाता है. इसी तरह जीनोम सीक्वेंसिंग में नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग के कारण महज 2 दिन में सभी जानकारी जुटाई जा सकती है. इसका उपयोग मेडिकल साइंस में बड़े पैमाने पर हो रहा है. इसके जरिए बायोलाॅजिकल और साइंटफिक रिजल्ट बहुत जल्दी मिल रहे हैं.कैंसर जैसी बीमारी, कोई अज्ञात बीमारी या कोरोना जैसी महामारियों को पता लगाने में इस तकनीक की अहम भूमिका है. इसके अलावा वानिकी, पर्यावरण, एग्रीकल्चर और यहां तक शहरी विकास में भी इस तकनीक का काफी उपयोग हो रहा है. ये तकनीक इतनी एडवांस है कि आप खाना खाने के बाद तुरंत देख सकते हैं कि आपके पेट के अंदर खाना किस क्रिया प्रक्रिया से गुजर रहा है.

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