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दिल्ली/NCR

AIIMS News: एम्स से मोहभंग! आखिर क्यों संस्थान छोड़ रहे हैं दिग्गज डॉक्टर्स? जानें इस्तीफे की 5 बड़ी वजहें

हाल के दिनों में ऐसा देखा गया है की नई दिल्ली एम्स से बड़ी तादाद में डॉक्टर छोड़कर दूसरे संस्थान जा रहे हैं. आरोप है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा बार-बार जारी निर्देशों के बावजूद एम्स प्रशासन उन्हें लागू करने में लगातार उदासीन रवैया अपना रहा है. कुछ डॉक्टरों का यह कहना है कि अब एम्स में पहले जैसा माहौल नहीं रहा और प्रशासनिक कार्य प्रणाली कुछ ऐसी हो गई है कि उन्हें छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों से एम्स के कुछ विभागों में मरीजों के एडमिशन, ट्रांसफर और डिस्चार्ज प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं. बताया जा रहा है कि इन अनियमितताओं का प्रभाव मरीजों की देखभाल, विभागीय ऑडिट और हॉस्पिटल सेंसेस तक पर पड़ रहा था. सूत्रों का दावा है कि डॉ. ए.के. बिसोई ने इन मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग उठाई थी और इन मुद्दों को तत्कालीन निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास के संज्ञान में भी लाया था.

नर्स ने लगाया आरोप

कुछ मामले ऐसे भी हैं जिसमें डॉक्टरों का आरोप है कि उन्हें जबरन अलग-अलग मामलों में उलझाया जाता है. हृदय शल्य चिकित्सक डॉ. ए.के. बिसोई से जुड़ा मामला भा सामने आया है. कथित रूप से कार्डियोलॉजी विभाग की एक महिला नर्स द्वारा दिए गए एक ग्रीवांस लेटर से शुरू हुआ, जिसमें उसने स्वयं यह उल्लेख किया था कि उससे सुचारु रूप से काम नहीं हो पा रहा है और इसी कारण उसने अपने ट्रांसफर का अनुरोध भी किया था.

यौन उत्पीड़न के आरोप खारिज

आरोप है कि इस ग्रीवांस को प्रशासनिक स्तर पर संबोधित करने के बजाय एम्स प्रशासन ने एम्स नर्स एसोसिएशन के जरिए देश के जाने-माने कार्डियक सर्जन डॉ. ए.के. बिसोई के विरुद्ध यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच शुरू कराई और मामले को एम्स की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को भेज दिया. हालांकि, आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने 23 अक्टूबर 2025 को अपनी रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज कर दिया.

प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल

सूत्र बताते हैं कि संबंधित प्रशासनिक एवं कंप्यूटर आधारित कार्यों की जिम्मेदारी उसी महिला नर्स के पास थी, जिसके बाद विभागीय कार्यप्रणाली और मरीजों की देखभाल को लेकर सवाल खड़े हुए. सूत्रों के अनुसार, इसी कारण उक्त नर्स ने स्वयं कार्य का दबाव संभाल पाने में असमर्थता जताते हुए अपना ट्रांसफर अनुरोध और शिकायत प्रस्तुत की थी. कुछ सूत्रों का यह भी मानना है कि डॉ. बिसोई द्वारा उठाए गए इन गंभीर प्रशासनिक और मरीज-हित से जुड़े मुद्दों से ध्यान हटाने और मामले को दबाने के उद्देश्य से उनके खिलाफ आरोपों को अनावश्यक रूप से बढ़ाया गया, जिससे पूरा मामला लंबे समय तक विवादों में उलझा रहे. इस पूरे घटनाक्रम ने संस्थान की प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

NCST की रिव्यू बैठक पर भी उठे सवाल

सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि पूरे मामले को कुछ प्रभावशाली समूह अपने तरीके से संचालित करने का प्रयास कर रहे हैं. हाल ही में, 10 मार्च को AIIMS दिल्ली में आयोजित NCST की एक रिव्यू बैठक को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. आरोप है कि बैठक के मिनट्स सार्वजनिक नहीं किए गए, ना ही NCST के वेबसाइट पर अब तक अपलोड किए गए हैं और न ही बैठक में शामिल सभी पक्षों को उपलब्ध कराए गए.

सूत्रों का यह भी मानना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 31 दिसंबर, 23 फरवरी एवं 15 अप्रैल को जारी निर्देशों में डॉ. बिसोई को CTVS विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य जारी रखने तथा इस संबंध में त्वरित कार्रवाई कर स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था. बताया जा रहा है कि इन निर्देशों के बावजूद अनुपालन सुनिश्चित न किए जाने को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा गंभीरता से लिया गया. चर्चाओं के अनुसार, एम्स दिल्ली के तत्कालीन निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास को निदेशक पद से हटाकर नीति आयोग का सदस्य बनाए जाने को भी इसी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि, आधिकारिक स्तर पर इस संबंध में कोई स्पष्ट टिप्पणी सामने नहीं आई है.

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