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विदेश

सवालों के घेरे में अमेरिकी श्रेष्ठता: जो देश  दुनिया का नेतृत्वकर्ता हो, वह घरेलू समस्याओं से निपटने में नाकाम

जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की घड़ी नजदीक आती जा रही है, तब वहां कुछ भी सही होता नहीं दिख रहा है। उदार लोकतंत्र की मिसाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वहां नवंबर में आने वाले जनादेश का सम्मान किया जाएगा? उससे हिंसा भड़कने का डर है, जो पहले ही ध्रुवीकरण को हवा दे रही है। असल में कुछ मोर्चों पर हालात हाथ से फिसल से गए हैं। जैसे कोविड-19 से निपटने को लेकर वाशिंगटन की रणनीति। यह इतनी लापरवाह भरी रही कि कोई अमेरिका से जवाब की आस तक नहीं लगा रहा। जनवरी में चीन के वुहान में कोरोना वायरस से फैली बीमारी फरवरी के अंत तक एक वैश्विक महामारी में बदल गई। कारगर उपचार के अभाव में उससे निपटने के लिए समूची अर्थव्यवस्था को बंद करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। परिणामस्वरूप आज अमेरिका में बेरोजगारी की समस्या महामंदी के स्तर जितनी विकराल हो गई है।

कोरोना का कोहराम: अमेरिका में एक लाख छोटे उद्यम बंदी के कगार पर

आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका में करीब एक लाख छोटे उद्यम बंदी के कगार पर हैं। वहीं व्यापार एवं तकनीक के मोर्चे पर चीन से संघर्ष वैश्विक राजनीति का बुनियादी टकराव बन गया है, जिसमें सुलह की कोई संभावना नहीं दिख रही। अमेरिका में कोरोना अभी भी कोहराम मचाए हुए है। उससे राहत के दूर-दूर तक आसार नहीं दिख रहे हैं। इस महामारी से होने वाली क्षति को कम करने में राजनीतिक नेतृत्व लाचार दिख रहा है। ऐसे में अमेरिका द्वारा खुद के लिए गढ़ी गई वैश्विक नेता की छवि तार-तार होती दिख रही है। इस आपदा ने कल्याणकारी राज्य के रूप में अमेरिका की कमजोरी की कलई खोल कर रख दी है और हालात से निपटने में लचर नीतियों ने मौजूदा संकट को और विकराल बना दिया है। अमेरिका में करीब 43 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा की सुविधा नहीं है। इन लोगों के पास सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी खास सहारा नहीं है। ऐसे में यह आपदा उन पर और बड़ी आफत बनकर टूटी है।

जब कोरोना संकट उबाल पर था तब पुलिस बर्बरता के चलते नस्लीय तनाव की आग भड़क उठी

अमेरिकी दुश्वारियों के लिए मानों इतना ही काफी नहीं था। जब कोरोना संकट उबाल पर था तब पुलिस बर्बरता के कारण अमेरिका में नस्लीय तनाव की आग भड़क उठी। 46 वर्षीय अफ्रीकी-अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की मई में पुलिस के हाथों हुई मौत पर अमेरिका में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसके कारण विरोध-प्रदर्शन, हिंसा, दंगे और पुलिसिया कार्रवाई की बाढ़ आ गई।

अमेरिका आंतरिक समस्याओं से निपटने में नाकाम

एक सर्वेक्षण के अनुसार करीब 55 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि पुलिसिया हिंसा एक बड़ी समस्या है। वहीं 58 प्रतिशत इस बात का समर्थन करते हैं कि नस्लवाद आज की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। इसी प्रकार दो-तिहाई अमेरिकियों को लगता है कि उनका देश गलत दिशा में जा रहा है। एक ऐसा देश जो गवर्नेंस और मानवाधिकार के मसले पर शेष विश्व को भाषण देता हो और जो खुद को दुनिया का नेतृत्वकर्ता मानता हो, वह अपनी आंतरिक समस्याओं से निपटने में नाकाम दिख रहा है

विरोध-प्रदर्शन के चलते अमेरिकी समाज और अधिक ध्रुवीकृत होता जा रहा

अमेरिका में विरोध-प्रदर्शन आज भी जारी हैं। इससे अमेरिकी समाज और अधिक ध्रुवीकृत होता जा रहा है। ऐसे कठिन हालात में राजनीतिक नेतृत्व लोगों को एकजुट करने और देश को एक साथ लाने में इच्छुक नहीं दिख रहा है। दरअसल यह चुनावी दौर है और ऐसे में अपने-अपने वोट बैंक को साधना ही आवश्यक है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इसे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों पर ऐसे तल्ख शब्दों के जरिये हमला किया कि एक मृत डेमोक्रेट ही वास्तव में बढ़िया डेमोक्रेट होता है।

अमेरिकी संस्थानों की साख रसातल में

फिलहाल अमेरिकी संस्थानों की साख रसातल में है। पुलिस बर्बरता के कारण अल्पसंख्यकों की हुई मौत और कोरोना के इलाज में अफ्रीकी-अमेरिकियों के साथ हो रहे पक्षपात ने विरोध-प्रदर्शनों को और आक्रोश से भर दिया है। नस्ल का मुद्दा अमेरिकी समाज और राज्य व्यवस्था के दिलो-दिमाग में बसा है। जहां तक आंतरिक मामलों को संभालने की बात है तो जो अमेरिका इस मामले में भारत सहित दूसरे देशों को अक्सर हेय दृष्टि से देखता आया हो, वही आज एकजुटता की आंतरिक कमी से पीड़ित महसूस कर रहा है, जिसका फिलहाल कोई समाधान भी नहीं सूझ रहा।

कोरोना के चलते बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमता, नस्लीय तनाव से यूएस सर्वोच्चता का अंत हो रहा

कोविड-19 महामारी के परिणाम, बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमता, राष्ट्रवाद का उफान और नस्लीय तनाव का मिश्रण अमेरिका को किस प्रकार से आकार देगा, इसकी अपने-अपने ढंग से कल्पना की जा रही है। कुछ लोग इसे इस रूप में देख रहे हैं कि अब वैश्विक मामलों में अमेरिकी सर्वोच्चता का अंत हो रहा है। यह भले सच हो या न हो, परंतु अमेरिका में स्वयं को उभारने की अथाह आंतरिक क्षमता है। इसे उसने अतीत में प्रदर्शित भी किया है।

आंतरिक विरोधाभासों के बावजूद भारत लोकतंत्र के रूप में अपना वजूद बचाए रखने में सफल रहा

अमेरिका की तुलना में भारत एक युवा राष्ट्र है। आंतरिक विरोधाभासों और विभाजक रेखाओं के बावजूद भारत एक लोकतंत्र के रूप में अपना वजूद बचाए रखने में सफल रहा है। इसके बावजूद भारत खुद को एक आधुनिक राष्ट्र राज्य के रूप में ढालने में जुटा है। इस राह में आने वाली चुनौतियों पर पश्चिमी आभिजात्य वर्ग ने रोने-पीटने से कभी परहेज नहीं किया। हालिया दौर में चाहे सीएए का मसला हो या फिर अल्पसंख्यकों का मुद्दा, उसमें एक रुझान यही देखने को मिला कि भारत को उस पश्चिमी मॉडल की धौंस दी जाए, जिसे वे उच्चस्तरीय मानते हैं। आज जब सर्वोच्चता का मिथक खंड-खंड हो रहा है तो भारत एक वैकल्पिक मॉडल यानी प्रतिरूप पेश कर सकता है। एक ऐसा प्रतिरूप जो कहीं अधिक भारतीय मूल्यों से ओतप्रोत हो।

अमेरिका और अधिक ध्रुवीकृत होगा और उसकी राजनीति में बढ़ेगा टकराव

ऐसा लगता है कि अमेरिका और अधिक ध्रुवीकृत होगा और उसकी राजनीति में टकराव भी बढ़ेगा। यह शायद ऐसा पड़ाव है कि भारत आंतरिक दुश्वारियों से निपटने में अमेरिका को एकाध सलाह दे सके। भारत में तमाम लोगों के लिए देश के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी आलोचना एक बड़ा संकेत होती है। पश्चिमी मीडिया में किसी एक आलेख से ही यह मान लिया जाता है कि भारत अपने आंतरिक मामलों में गड़बड़ी कर रहा है। अब वक्त आ गया है कि हम भारत की उपलब्धियों को लेकर अधिक आत्मविश्वास का परिचय दें और भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप की अनदेखी के साथ ही उसकी आवश्यक भर्त्सना भी करें।

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