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सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के खिलाफ बने कानून का दायरा बढ़ाकर महिलाओं को व्यापक अधिकार दिया

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इसके तहत अब घरेलू हिंसा की शिकार महिला को सास-ससुर समेत पति के किसी भी रिश्तेदार के घर में रहने का अधिकार होगा। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण कानून, 2005 की धारा-2(एस) का दायरा विस्तारित कर दिया है, जिसमें पति के साझा घर की परिभाषा है। इसके अनुसार हिंसा के बाद घर से निकाली गई महिला को अब दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। वह पति के साझा घर में रह सकेगी, जो इससे पहले मुमकिन नहीं था।

महिलाओं के साथ परिवार में हो रही हिंसा को रोकने के लिए वर्ष 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण देने के लिए यह कानून बनाया गया था। यह पत्नी, मां, बहन, बेटी, घरेलू महिला रिश्तेदारों पर हो रही शारीरिक, मानसिक, लैंगिक और आíथक प्रताड़ना से उनकी रक्षा करता है। इसमें घरेलू रिश्तों में किसी भी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, शारीरिक अंगों को चोट पहुंचाना अपराध की श्रेणी में आता है। दहेज, संपत्ति की मांग करना और एक ही घर में रहने वाले पिता, पति, भाई, ननद, सास, ससुर द्वारा तंग करना भी अपराध माना गया है। इसके साथ ही घरेलू कार्यो में रुकावट डालना, बच्चों एवं महिला को खर्च के पैसे न देना और महिला से उसकी संपत्ति छीन लेना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक वर्ष 2013 में घरेलू हिंसा के 1,18,866 मामले दर्ज किए गए थे। 2012 के मुकाबले 2013 में इन घटनाओं में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इसके अलावा वर्ष 2018 में घरेलू हिंसा के तहत सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे, जिसमें महिलाओं के पति या अन्य रिश्तेदार शामिल थे। इस दौरान महिलाओं को शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाने के करीब 27.6 फीसद मामले दर्ज हुए थे।

हमारे देश में अधिकांश महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा ङोलती हैं, जो कई बार हत्या में भी बदल जाती हैं। इन घटनाओं के बढ़ने का एक प्रमुख कारण महिलाओं को इस कानून की जानकारी का न होना है। जब एक लड़की अपने माता-पिता का घर छोड़कर शादी करके ससुराल आती है तो वही हमेशा के लिए उसका घर हो जाता है। ऐसे में महिलाओं के साथ हिंसा करना, उन्हें जबरन घर से बाहर निकालना कोई मर्दानगी नहीं है। जानकारी के अभाव में वे महिलाएं भी अपने साथ हो रहे र्दुव्‍यवहार को सहती रहती हैं। हिंसा करने वाले के साथ उसे सहने वाला भी कहीं न कहीं उतना ही अपराधी माना जाता है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के विरुद्ध बने कानून का दायरा विस्तृत कर महिलाओं को उच्चतर अधिकार दिया है, जो स्वागतयोग्य है। ऐसे में महिलाओं को अब डरने की नहीं, बल्कि जागरूक होने की आवश्यकता है।

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