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फिल्म को चाहिए एक अदद तड़का: फिल्म शूटिंग शुरू होने से पहले ही विवादों में घिरे तो बिना खर्च किए पब्लिसिटी पक्की

एक फिल्म बन रही थी। उसकी कहानी में एक्शन, रोमांस, हिंसा, सस्पेंस, गालियां, आइटम सांग सहित सभी मसाला था, लेकिन ए टू जेड, कहीं पर भी ऐसा कुछ था ही नहीं, जिस पर कंट्रोवर्सी तो क्या उसकी जरा सी संभावना भी दिखाई देती। फिल्म निर्माता जानता है कि कंट्रोवर्सी मतलब टिकट खिड़की पर नोटों की मूसलाधार बारिश। चिंतित निर्माता महोदय ने लेखक से कहा-एक्शन, रोमांस वगैरह-वगैरह रुटीन मैटर तो सब ठीक है, लेकिन असली चीज कहां है? असली चीज यानी स्कोप ऑफ कंट्रोवर्सी।

घर फूंककर तमाशा देखने वालों में लेखक था नहीं

लेखक मासूमियत का लबादा ओढ़कर बोला-वह तो नहीं है, सर। फिर क्या खाक है इसमें-निर्माता को गुस्सा आना स्वाभाविक था। आफ्टरऑल करोड़ों रुपया तो उसी का दांव पर लगने वाला था और घर फूंककर तमाशा देखने वालों में से वह था नहीं।

कंट्रोवर्सी फिल्म की पब्लिसिटी खर्च किए बिना होती है

इतना सुनकर भी लेखक शांत नहीं रहा, बल्कि निर्माता के प्रति सहानुभूति जताते हुए बोला कि सर किसी भी किस्म की कंट्रोवर्सी से तो मैं ख़़ुद ही जानबूझकर बचा हूं, क्योंकि कंट्रोवर्सी होगी तो यह भी हो सकता है कि लोग-बाग आपकी फिल्म की शूटिंग तक शुरू न होने दें। यह सुनते ही निर्माता खुशी से चहक उठा। उसने कहा कि यही तो मैं भी चाहता हूं। फिल्म बनना शुरू होने से पहले ही विवादों में घिरेगी तो मीडिया की मेहरबानी से सबकी जुबान पर हमारी ही फिल्म का नाम होगा और बिना एक धेला खर्च किए फिल्म की भरपूर पब्लिसिटी भी हो जाएगी।

फिल्म बनेगी ही नहीं तो पब्लिसिटी किस काम आएगी

हो सकता है कि लोगों के पुरजोर विरोध के चलते आपको फिल्म की शूटिंग ही बंद करनी पड़े। फिल्म बनेगी ही नहीं तो पब्लिसिटी किस काम आएगी-लेखक अपनी चिंता प्रकट करते हुए बोला।

विरोधियों के भी विरोधी होते हैं

इसकी काट में निर्माता ने कहा कि यह भी ठीक है, लेकिन तुम ये क्यों भूल जाते हो कि विरोधियों के भी तो कुछ विरोधी होते हैं। हमारे दुश्मनों का भी तो कोई दुश्मन होगा और वह हमारा क्या होगा…सो सिंपल …दोस्त होगा! अब जैसा कि हर मुद्दे को लेकर होता है, यहां भी वैसा ही होगा। लोग दो हिस्सों में बंट जाएंगे। एक वे जो हमारी फिल्म का विरोध करेंगे और दूसरे वे जो भले ही मन से हमारा समर्थन बिल्कुल न करना चाहते हों, लेकिन उन्हें भी तो अपनी दुकानदारी चलानी है न! उनका विरोधी तबका हमारी फिल्म को गलत बताएगा तो उन्हें यकीनन अहसास होगा कि हमारी फिल्म में उनके लिहाज से जरूर कुछ बढ़िया है। मजबूरी में ही सही, लेकिन वे हमारे विरोधियों के विरोध में यानी हमारे समर्थन में आ खड़े होंगे।

कंटोवर्शियल माल तैयार

रही बात फिल्म के बनने की, वह तो देर-सबेर बनकर ही रहेगी। हद से हद यही होगा न कि फिल्म बनने के बाद हम इसे अपने ही देश में रिलीज नहीं कर पाएंगे। फिर विदेशी बाजार है न। वैसे भी डॉलरों की झमाझम बारिश के आगे नोटों की बूंदाबूंदी की भला क्या बिसात? तुम तो बस ये बताओ कि कहानी से कंट्रोवर्सी कैसे हो! दो-चार सीन सजेस्ट तो करो! रही बात देसी बाजार की तो वहां भी ओटीटी जिंदाबाद। हम ओटीटी वालों से भरपूर वसूली कर लेंगे कि भाई भरपूर कंटोवर्शियल माल तैयार किया है हमने।

आइडिया पुराना हो चुका-निर्माता को बात जंची नहीं

निर्माता की इच्छा को आदेश मानकर लेखक शुरू हो जाता है। वह अपनी बात शुरू करता है-ऐसा करते हैं सर कि 60 साल का नायक ले लेते हैं और दिखा देंगे कि वह अपनी 18 साल की बेटी की हमउम्र सहेली से इश्क कर बैठता है। यह आइडिया तो पुराना हो चुका है-निर्माता को बात कुछ जंची नहीं।

60 साल की हीरोइन को थियेटर में देखने आएगा कौन

लेखक दिमाग के घोड़े तेजी से दौड़ाता है और थोड़ी ही देर के चिंतन के बाद चिंहुक उठता है। आइडिया सर! 60 साल की नायिका अपने 18 साल के बेटे के हमउम्र दोस्त के प्यार में पागल हो जाती है। मगर इस बार निर्माता लेखक की उम्मीद के मुताबिक एक्साइट होने के बजाय उलटे लेखक को डांटने लगता है-कमाल करते हो यार! इससे कंट्रोवर्सी कितनी भी क्यों न पैदा हो जाए, लेकिन ये बताओ कि तुम्हारी 60 साल की हीरोइन को थियेटर में देखने आएगा कौन? बूढ़ा हीरो तो एक बार फिर भी चल जाता है, लेकिन हीरोइन तो किसी भी लिहाज से 18 के आसपास की ही होनी चाहिए न! लेखक डांट खाने के बाद कुछ और कंट्रोवर्शियल किस्म के सीन सजेस्ट करने की कोशिश में लग गया।

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