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भोपाल रियासत की अंतिम हिंदू शासक महान गोंड रानी कमलापति

इतिहास के पन्ने पलटने पर ज्ञात होता है कि सन् 1600 से 1715 तक गिन्नौरगढ़ किले पर गोंड राजाओं का आधिपत्य रहा तथा भोपाल पर भी उन्हीं का शासन था। गोंड राजा निजाम शाह की सात पत्नियां थीं, जिनमें कमलापति सबसे सुंदर थीं। उनकी इच्छा से तालाब के तट पर एक महल का निर्माण किया गया, जो सन् 1702 में पूर्ण हुआ, जिसे आज भोपाल में रानी कमलापति महल के नाम से जाना जाता है। गोंड समुदाय का राजवंश गिन्नौरगढ़ से बाड़ी तक फैला था। उनका साम्राज्य गढ़ा कटंगा (मंडला) 52 गढ़ के आधिपत्य में था। रायसेन किला ईस्वी सन् 1362 से 1419 (57 वर्ष) तक राजा रायसिंह के आधिपत्य में था। बाड़ी, जिला रायसेन के अंतिम शासक चैन सिंह 16वीं सदी में रहे।

16वीं सदी में सलकनपुर, जिला सीहोर रियासत के राजा कृपाल सिंह सरौतिया थे। उनके शासन काल में प्रजा बहुत खुश और संपन्न् थी। उनके यहां एक खूबसूरत कन्या का जन्म हुआ। वह बचपन से ही कमल की तरह सुंदर थी इसलिए नाम कमलापति रखा गया। वह बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और साहसी थी तथा शिक्षा, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, तीर-कमान चलाने में उसे महारत हासिल थी। वह अनेक कलाओं में पारंगत होकर सेनापति बनी। वह अपने पिता के सैन्य बल के साथ और महिला साथी दल सहित युद्धों में शत्रुओं से लोहा लेती थीं। राजकुमारी बड़ी हुईं तो उनकी सुंदरता की चर्चा चारों दिशाओं में होने लगी। इसी सलकनपुर राज्य में बाड़ी किले के जमींदार का लड़का चैन सिंह, जो राजा कृपाल सिंह सरौतिया का भांजा लगता था, राजकुमारी कमलापति से विवाह की इच्छा रखता था। किंतु राजकुमारी कमलापति ने उससे विवाह करने से मना कर दिया था। उसी दौर में भोपाल से 55 किलोमीटर दूर 750 गांवों को मिलाकर गिन्नौरगढ़ राज्य बनाया गया, जो देहलावाड़ी के पास है।

इसके राजा सुराज सिंह शाह (सलाम) थे। इनके पुत्र निजाम शाह थे, जो बहुत बहादुर, निडर तथा हर कार्य में निपुण थे। उन्हीं से रानी कमलापति का विवाह हुआ। राजा निजाम शाह ने रानी कमलापति के प्रेम स्वरूप ईस्वी 1700 में भोपाल में सात मंजिला महल का निर्माण करवाया। रानी कमलापति का वैवाहिक जीवन खुशहाल था। उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम नवल शाह था। बाड़ी किले के जमींदार का लड़का चैन सिंह राजा निजाम शाह का भतीजा था।

वह कमलापति का विवाह हो जाने के बावजूद उनसे विवाह की इच्छा रखता था। उसने अनेक बार राजा निजाम शाह को मारने की कोशिश की, जिसमें वह असफल रहा। एक दिन प्रेमपूर्वक उसने राजा निजाम शाह को भोजन पर आमंत्रित किया और भोजन में जहर देकर धोखे से उनकी हत्या कर दी और रानी कमलापति को अकेले जानकर उन्हें पाने की नीयत से गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला कर दिया। रानी कमलापति ने अपने कुछ वफादारों और 12 वर्षीय बेटे नवल शाह के साथ भोपाल में बने इस महल में शरण लेने का निर्णय लिया। कुछ दिन भोपाल में समय बिताने के बाद रानी कमलापति को पता चला कि भोपाल की सीमा के पास कुछ अफगानी आकर रुके हैं। इन अफगानों का सरदार दोस्त मोहम्मद खान था, जो पैसा लेकर युद्ध लड़ता था। लोक मान्यता है कि रानी कमलापति ने दोस्त मोहम्मद को एक लाख मुहरें देकर चैनसिंह पर हमला करने को कहा। दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला कर किले को हड़प लिया। हमले में चैनसिंह मारा गया। किंतु फिर दोस्त मोहम्मद संपूर्ण भोपाल की रियासत पर कब्जा करना चाहता था। उसने रानी कमलापति को अपने हरम (धर्म) में शामिल होने और शादी करने का प्रस्ताव रखा। दोस्त मोहम्मद खान के इस नापाक इरादे को देखते हुए रानी कमलापति का 14 वर्षीय बेटा नवल शाह अपने 100 लड़ाकों के साथ लाल घाटी में युद्ध करने चला गया। घमासान युद्ध हुआ, जिसमें नवल शाह की दुखद मृत्यु हो गई।

इस स्थान पर इतना खून बहा कि जमीन लाल हो गई। इसी कारण इसे लाल घाटी कहा जाने लगा। इस युद्ध में रानी कमलापति के दो लड़ाके बच गए थे, जो जान बचाते हुए मनुआभान की पहाड़ी पर पहुंचे और काला धुआं कर संकेत किया कि ‘हम युद्ध हार गए हैं। रानी कमलापति ने विषम परिस्थिति देखते हुए बड़े तालाब बांध का संकरा रास्ता खुलवाया, जिससे बड़े तालाब का पानी रिसकर छोटे तालाब में आने लगा। इसमें रानी कमलापति ने महल की समस्त धन-दौलत, आभूषण डालकर स्वयं जल-समाधि ले ली। दोस्त मोहम्मद खान जब तक किले तक पहुंचा, तब तक सबकुछ खत्म हो गया था। रानी कमलापति ने जीते जी भोपाल पर परधर्मी को नहीं बैठने दिया। स्रोतों के अनुसार रानी कमलापति ने सन् 1723 में अपनी जीवन-लीला खत्म की थी। उनकी मृत्यु के बाद भोपाल में नवाबों का कब्जा हुआ। नारी अस्मिता और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए रानी कमलापति ने जल-समाधि लेकर इतिहास में अमिट स्थान बनाया है।

उनका यह कदम उसी जौहर परंपरा का पालन था, जिसमें हमारी नारी शक्ति ने अदम्य साहस के साथ अपनी अस्मिता, धर्म और संस्कृति को बचाया। गोंड रानी कमलापति आज तीन सौ वर्ष बाद भी प्रासंगिक हैं और उनके बलिदान का सम्मान करके हम कृतज्ञ हैं। भोपाल का हर हिस्सा उनकी कहानी सुनाता है। यहां के तालाबों के पानी में उनके बलिदान की गूंज आज भी सुनी जा सकती है। लगता है मानो गोंड रानी अब पानी बनकर भोपाल की रवानी में अविरल बहती हैं।

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