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बिहार

कभी लालू के दुलारे, फिर दिखाए बगावती तेवर, जानें कौन हैं 5 बार के बाहुबली सांसद पप्पू यादव

बिहार की राजनीति में पप्पू यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं है. पांच बार सांसद रह चुके पप्पू यादव चार बार विधायक भी रहे हैं. एक समय था जब वह राजद सुप्रीमो लालू यादव के दुलारे थे, लेकिन एक समय वह भी आया जब उन्होंने लालू यादव के खिलाफ खुल कर बगावत की. मोर्चा खोल कर लालू-नीतीश की जोड़ी को हराने के लिए वह पूरी ताकत झोंक दिए थे. अब एक बार फिर समय बदला है, और समय के साथ पप्पू यादव के तेवर भी बदले हैं. पत्नी को पहले ही कांग्रेस के टिकट पर राज्य सभा भेज चुके पप्पू यादव अब खुद कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं.

24 दिसंबर 1967 को बिहार के पूर्णिया जिले के एक जमीदार परिवार में पैदा हुए पप्पू यादव का आधिकारिक नाम राजेश रंजन है. उन्होंने सुपौल के आनंद मार्ग स्कूल आनंद पल्ली से स्कूली शिक्षा ली और फिर राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन के लिए बीएन मंडल यूनिवर्सिटी चले गए. इसके बाद उन्होंने इग्नू से आपदा प्रबंधन और मानवाधिकार में डिप्लोमा किया. वह बचपन से ही सामाजिक प्रवृति के थे. पहले गांव में और फिर बाद में इलाके में कहीं कोई घटना दुर्घटना हो जाए तो वह सबसे पहले पहुंचते.

पत्नी रंजीत रंजन भी सांसद

समाज सेवा की वजह से वह चुनावी राजनीति में आने से पहले ही काफी चर्चित हो चुके थे. चूंकि जमीदार परिवार में पैदा हुए थे, इसलिए मनबढ़ भी थे. शिक्षा पूरी होने के बाद उनकी शादी रंजीत रंजन के साथ हुई और फिर वह दोनों राजनीति में आ गए. पप्पू यादव ने खुद अपनी राजनीतिक जमीन मधेपुरा को बनाई, वहीं पत्नी को सुपौल से सांसद बनवाया. उनका एक बेटा सार्थक रंजन है, जो टी-20 में दिल्ली टीम का खिलाड़ी है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक पप्पू यादव पांच बार सांसद रहे. वहीं चार बार वह विधानसभा भी पहुंचे.

सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार

साल 2015 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार भी मिला था. लालू यादव से विरोध के बाद पप्पू यादव ने खुद की पार्टी बनाई और बिहार विधानसभा के पिछले चुनावों में 64 सीटों पर प्रत्याशी उतार कर वह लालू नीतीश की जोड़ी के खिलाफ खूब प्रचार भी किए. हालांकि वह इस चुनाव में कोई खास फर्क नहीं डाल पाए थे. पप्पू यादव ने साल 1990 में अपनी चुनावी राजनीति शुरू की और एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बिहार के मधेपुर की सिंहेश्वर विधानसभा से मैदान में उतरे.

पहले चुनाव में मिली विजय

जनता ने भी उन्हें हाथोंहाथ लिया और पहले ही चुनाव में जीता कर उन्हें पटना भेज दिया. फिर अगले ही साल 1991 में वह पूर्णिया लोकसभा सीट से मैदान में उतरे और जीत हासिल की. इसके बाद वह साल 2015 तक कभी राजद तो कभी सपा और लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर जीत कर संसद पहुंचते रहे. हालांकि 7 मई 2015 को लालू यादव ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था. उनके ऊपर आरोप पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का था. ऐसे में उन्होंने तुरंत जन अधिकार पार्टी के नाम से अपनी पार्टी गठित कर ली थी.

बुरा दौर

पप्पू यादव के लिए साल 2009 का समय काफी मुश्किल भरा रहा. पटना हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए जाने की वजह से 2 अप्रैल 2009 को उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया. इसका असर यह हुआ कि उनकी मां शांति प्रिया भी पूर्णिया सीट से चुनाव हार गईं. फिर आया 2014 का चुनाव, इसमें पप्पू यादव ने जेडीयू के संस्थापक शरद यादव को हराया. इसके बाद ही उनकी पत्नी रंजीता रंजन कांग्रेस में शामिल हो गई. हालांकि साल 2019 के चुनावों में वह हार गई तो कांग्रेस ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया था. इधर, सितंबर 2020 में पप्पू यादव ने बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पीपुल्स डेमोक्रेटिक अलायंस (पीडीए) बनाया था. इस गठबंधन में बहुजन मुक्ति पार्टी और एसडीपीआई के अलावा भारतीय मुस्लिम लीग और चंद्रशेखर की भीम आर्मी भी शामिल थी.

विवादों से गहरा नाता

पप्पू यादव का विवादों से पुराना नाता है. साल 1998 के अजीत सरकार हत्याकांड में उन्हें साल 2008 में सजा हो गई थी और जेल जाना पड़ा था. हालांकि इस साल 2013 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी भी कर दिया था. इसके बाद नवंबर 2013 में उन्होंने एक किताब में यशवंत सिन्हा पर गंभीर आरोप लगाए थे. इसमें उन्होंने कहा था कि उनकी इंडियन फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी के तीन सांसदों को साल 2001 में एनडीए में शामिल कराने की कोशिश की गई. इसके लिए तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने पैसे दिए थे.

रुडी के खिलाफ खोला था मोर्चा

इसी प्रकार उन्होंने साल 2008 के विश्वास मत के दौरान कांग्रेस और भाजपा ने अपने समर्थन के लिए सांसदों का सौदा किया था. पप्पू यादव साल 2015 में भी चर्चा में आए. इस बार उनकी चर्चा एक एयरहोस्टेस को चप्पल से पीटने की वजह से हुई तो मई 2021 में 32 साल पुराने एक अपहरण केस में उनका नाम खूब उछला. यही नहीं उन्हें कोरोना काल में COVID-19 मानदंडों के उल्लंघन के आरोप में भी गिरफ्तार किया गया था. उस समय वह एंबुलेंस के कुप्रबंधन को लेकर बीजेपी नेता राजीव प्रताप रुडी के खिलाफ मोर्चा खोल दिए थे.

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