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धार्मिक

Premanand Maharaj Quotes: माया-मोह से मुक्ति और मन की शांति के लिए अपनाएं प्रेमानंद महाराज की ये 5 बातें

आज के समय में भागदौड़ भरी जिंदगी और जिम्मेदारियों के बीच इंसान अक्सर खुद को मोह-माया के जाल में उलझा हुआ महसूस करता है. खासतौर पर गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या परिवार, पत्नी और सांसारिक जिम्मेदारियां आध्यात्मिक मार्ग में बाधा बनती हैं? इसी विषय पर हाल ही में हुए एक धार्मिक सत्संग में प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने बेहद सरल और गहराई से भरी बातें बताईं, जो हर गृहस्थ व्यक्ति के लिए जीवन बदलने वाली सीख साबित हो सकती हैं.

भगवान की माया और पत्नी का नाम भी माया

सत्संग के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज के सामने अपनी दिलचस्प दुविधा रखी. भक्त ने कहा, महाराज जी, मुझे तो दोहरी माया ने घेर रखा है. एक तरफ भगवान की माया है और दूसरी तरफ मेरी पत्नी, जिनका नाम भी ‘माया’ है. क्या ये दोनों मेरे लिए बाधा हैं? भक्त ने स्वयं अपनी समझ साझा करते हुए पूछा कि क्या माया तब तक बाधक नहीं है जब तक हम अपनी वासनाओं पर नियंत्रण रखना जानते हैं? इस पर महाराज जी ने बहुत ही सुंदर और गहरा जवाब दिया.

प्रेमानंद महाराज ने दिया मंत्र

प्रेमानंद महाराज ने समझाया कि असली समस्या बाहर की दुनिया या आपकी पत्नी नहीं है, बल्कि आपके भीतर की वासना है. यदि आप अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण पा लेते हैं और समाज व परिवार के प्रति अपना व्यवहार सही रखते हैं, तो माया आपको कभी परेशान नहीं करेगी.

अभिमान छोड़ें, नम्रता अपनाएं

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, माया भगवान की एक ‘दैवी शक्ति’ है. कोई भी व्यक्ति अपने अहंकार के बल पर माया को नहीं जीत सकता. इससे पार पाने का एकमात्र तरीका नम्रता है. भगवान के सामने समर्पण और स्वभाव में कोमलता लाकर ही इस संसार रूपी सागर से सुरक्षित पार उतरा जा सकता है.

पत्नी माया नहीं, अर्धांगिनी और प्राण है

भक्त के सवाल पर विशेष रूप से बोलते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि अर्धांगिनी आपके प्राणों के समान होती है. जैसे हम अपने शरीर का ख्याल रखते हैं, वैसे ही पत्नी का सम्मान और पोषण करना चाहिए. जिसे आप बाधा मान रहे हैं, यदि आपका आचरण सही है, तो वही पत्नी लोक और परलोक की यात्रा में आपकी सबसे बड़ी सहयोगी बनेगी. ”

आचरण सही तो माया भी आनंदमयी

प्रेमानंद महाराज ने एक बहुत ही गहरा उदाहरण देते हुए कहा कि माया एक मां की तरह है जो हमारा पोषण करती है. असली दुख का कारण माया नहीं, बल्कि हमारे गलत विचार, गलत आचरण और पाप कर्म हैं. यदि हम अपना चिंतन शुद्ध कर लें और भगवान के नाम का सहारा लें, तो यही माया हमारे लिए आनंद का मार्ग बन जाती है.

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