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Bengal Economy: यूपी और ओडिशा की तर्ज पर बंगाल का कायाकल्प; ‘डबल इंजन’ सरकार से अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार

बीजेपी का ‘डबल इंजन’ गवर्नेंस मॉडल, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी का शासन होता है, ने पहले ही उत्तर प्रदेश, ओडिशा और असम की आर्थिक दिशा बदल दी है. BJP शासन में इन तीनों राज्यों में कैपिटल एक्सपेंडिचर में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. जहां उत्तर प्रदेश में कैपेक्स पिछली सरकारों के 15.7 फीसदी से बढ़कर 19.2 फीसदी हो गया. वहीं दूसरी ओर ओडिशा में यह 12.3 फीसदी के मुकाबले 18.7 फीसदी रहा. अगर बात असम की करें तो पिछली सरकारों के 0.4 फीसदी के मुकाबले में बढ़कर 21.5 फीसदी पर पहुंच गया. अब, 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में BJP को 207 सीटों का ऐतिहासिक जनादेश मिलने के साथ, वही इंफ्रास्ट्रक्चर-बेस्ड विकास मॉडल अब इस राज्य में भी लागू होने वाला है.

इस चुनावी नतीजे के साथ ही ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC का 15 साल से ज्यादा पुराना शासन समाप्त हो गया है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल अब उस स्थिति में आ गया है, जिसे Elara Capital के विश्लेषक भारत के “कैपिटल एक्सपेंडिचर के महाअभियान” (Capex juggernaut) का अगला चरण बता रहे हैं, जो अब पूरब की ओर बढ़ रहा है. राज्य का कैपेक्स (Capital outlay), GSDP के हिस्से के तौर पर, अभी सिर्फ 2 फीसदी है, जबकि ओडिशा में यह 6.6 फीसदी, यूपी में 4.5 फीसदी और मध्य प्रदेश में 4.3 फीसदी है. अगर BJP अपने दूसरे राज्यों के शानदार रिकॉर्ड का एक छोटा सा हिस्सा भी यहां दोहरा पाती है, तो यह अंतर बहुत तेजी से कम हो जाएगा.

अब बंगाल की इकोनॉमी को मिलेगी रफ्तार?

नई सरकार को आर्थिक मोर्चे पर जो कमजोरी विरासत में मिली है, वह बहुत साफ है. वित्त वर्ष 2018 और 2025 के बीच भारत की GDP में पश्चिम बंगाल का योगदान 28 बेसिस पॉइंट कम हो गया, जबकि इसी दौरान उत्तर प्रदेश का योगदान 20 बेसिस पॉइंट बढ़ गया. 2012 से अब तक लगभग 6,888 कंपनियां राज्य छोड़कर चली गई हैं. BJP के फैक्टर सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर का मकसद कंपनियों के इस पलायन को रोकना है.

पार्टी के घोषणापत्र में इसके लिए पूरी योजना बताई गई है, जिसमें ताजपुर और कुलपी में गहरे पानी वाले पोर्ट, कोलकाता मेट्रो का पूरा होना, 61 रुके हुए रेल प्रोजेक्ट्स को फिर से शुरू करना, ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण सिंगूर जगह पर एक इंडस्ट्रियल पार्क बनाना, पुरुलिया, मालदा और बालुरघाट में नए हवाई अड्डे बनाना, और जूट उद्योग को फिर से जिंदा करने के लिए खास प्रयास करना शामिल हैं.

आर्थिक संतुलन की चुनौती: कैपेक्स बनाम फ्री स्कीम्स

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विस की एक रिपोर्ट के अनुसार, BJP के अपने घोषणापत्र में ऐसे वादे हैं जिन पर बहुत ज्यादा खर्च आएगा— जिसमें महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपए, किसानों को 9,000 रुपए, बेरोज़गारी भत्ता, और धान के MSP में 30 फीसदी की बढ़ोतरी शामिल है. अनुमान है कि इन पर बार-बार होने वाला खर्च 70100 अरब रुपए बढ़ जाएगा, जो राज्य की GDP का लगभग 3.4 फीसदी होगा.

यह एक बड़े राष्ट्रीय रुझान का हिस्सा है. 2023 से, राज्यों ने केंद्र सरकार के आर्थिक एकीकरण (fiscal consolidation) के रास्ते से दूरी बना ली है; वित्त वर्ष 2026 (अनुमानित) में राज्यों का कुल फिस्कल डेफिसिट जीडीपी GDP का 3.4 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि लक्ष्य 3.1 फीसदी का था. विश्लेषकों का कहना है कि राजकोषीय घाटा/GDP की 3 फीसदी की ऊपरी सीमा अब असल में निचली सीमा बनती जा रही है. इससे उत्पादक खर्च की क्वालिटी पर खतरा मंडरा रहा है, ठीक ऐसे समय में जब पूंजीगत खर्च (capex) में तेजी आ रही है.

बंगाल का जनादेश क्या दे रहा संकेत?

एलारा कैपिटल का मानना ​​है कि इसके असर कोलकाता से कहीं आगे तक फैलेंगे. ओडिशा, असम, बिहार, छत्तीसगढ़ और अब पश्चिम बंगाल के BJP शासन के तहत आने से, पार्टी ने पूर्वी भारत पर अपनी पकड़ इस तरह मजबूत कर ली है कि अब उसकी राष्ट्रीय पहुंच को लेकर कोई बहस बाकी नहीं रह गई है.

डेवलपमेंट पर जोर देने से बंगाल में लगातार ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (लोगों का वापस लौटना) शुरू होने की भी उम्मीद है. इससे केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र में कम समय के लिए मजदूरों की कमी हो सकती है, जबकि कृषि क्षेत्र में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने को बढ़ावा मिल सकता है.

बाज़ारों के लिए, यह फैसला केंद्र स्तर पर नीतियों की निरंतरता को मजबूत करता है और फरवरी-मार्च 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले BJP की स्थिति को और मजबूत बनाता है. पश्चिम बंगाल के लिए—जिसके पास बंगाल की खाड़ी का तट, खनिज भंडार और बेहतरीन मानव संसाधन हैं—यह वादा है कि उसके ये लंबे समय से सुप्त पड़े फायदे अब आखिरकार काम आने वाले हैं.

ममता बनर्जी के 15 साल के गवर्नेंस के काम

  1. ममता बनर्जी के 15 साल के कार्यकाल (20112026) का आर्थिक लेखा-जोखा एक जटिल तस्वीर पेश करता है—पूर्ण रूप से देखें तो इसमें काफ़ी विकास हुआ है, जनकल्याण पर ज़ोर दिया गया है, लेकिन साथ ही राजकोषीय चुनौतियां भी बढ़ी हैं.
  2. जब 2011 में TMC सत्ता में आई, तो उसे ‘लेफ्ट फ्रंट’ से विरासत में एक मुश्किल राजकोषीय स्थिति मिली थी. इसके बाद के डेढ़ दशक में, GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) पूर्ण रूप से लगभग पांच गुना बढ़ गया.
  3. वित्त वर्ष 2025 तक NSDP (शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद) लगभग 16.32 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया. पहले कार्यकाल (20112016) में कृषि और सर्विस सेक्टर की बदौलत कुल औसत विकास दर लगभग 17 फीसदी रही.
  4. हाल के वर्षों में विकास की गति धीमी पड़ने के संकेत मिले हैं—वित्त वर्ष 2025 में बंगाल की विकास दर लगभग 9 फीसदी रही, जो तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र (11.8%15.7%) से पीछे थी, और कई बार तो बिहार और ओडिशा जैसे पारंपरिक रूप से धीमी गति वाले राज्यों से भी पीछे रह गई.
  5. ढांचागत रूप से देखें तो, भारत की GDP में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी लंबे समय से लगातार घट रही है.1960 में इसकी हिस्सेदारी लगभग 10.5 फीसदी थी, जो 202324 तक घटकर लगभग 5.6 फीसदी% रह गई. यह गिरावट कई अलग-अलग राजनीतिक सरकारों के दौर में जारी रही.
  6. इस पूरे समय के दौरान, राज्य पर लगभग 8 लाख करोड़ रुपए का कर्ज जमा हो गया. जो देश के कई राज्यों के मुकाबले में काफी ज्यादा है.
  7. कल्याण के मोर्चे पर, कैपेक्स 18 गुना बढ़ गया और 2023 के मल्टी डायमेंशियल पोवरटी इंडेक्स के अनुसार, BPL आबादी 2010 के लगभग 25 फीसदी से घटकर 12 फीसदी से कुछ ही कम रह गई.
  8. कन्याश्री, सबुज साथी और रूपश्री जैसी प्रमुख योजनाओं ने मानव पूंजी को बढ़ाया और ग्रामीण मांग को प्रोत्साहित किया — लेकिन आलोचकों ने लगातार अन्य प्रमुख राज्यों की तुलना में औद्योगिक निवेश में गिरावट को उजागर किया.

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