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कोविड-19 का नकारात्मक आर्थिक प्रभाव, देशव्यापी लॉकडाउन ने सिकोड़ दी देश की मजबूत अर्थव्यवस्था

कभी-कभी सरकारी तंत्र को किसी ऐसी बात को जो अपने आप में काफी स्पष्ट हो, स्वीकार करने में वक्त लग जाता है। आखिरकार बीते शुक्रवार भारतीय रिजर्व बैंक ने यह मान लिया कि 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि नकारात्मक रहने का अनुमान है। वास्तव में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास यह कहना चाह रहे थे कि इस वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी। पिछले छह दशकों में इससे पहले ऐसा केवल चार बार हुआ है। इससे पहले 1979-80 में आखिरी बार भारतीय अर्थव्यवस्था सिकुड़ी थी। इस सिकुड़न की दर 5.24 फीसद रही थी। हालांकि दास ने सिकुड़न की दर के बारे में बात नहीं की, लेकिन कई आर्थिक संस्थाओं ने अपना पूर्वानुमान दे दिया है।

2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था 12.5 फीसद सिकुड़ेगी

अगर नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की मानें तो 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था 12.5 फीसद सिकुड़ेगी। यह पूर्वानुमान केंद्रीय सरकार के आर्थिक पैकेज की घोषणा होने के दौरान आया था। गोल्डमैन साक्स और नोमुरा के विशेषज्ञों की मानें तो इस वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 5 फीसद सिकुड़ सकती है। बर्नस्टीन के अर्थशास्त्रियों की मानें तो यह सिकुड़न 7 फीसद तक हो सकती है।

2020-21 में आर्थिक विकास की दर 2 फीसद रहेगी: मुख्य आर्थिक सलाहकार 

इन सब पूर्वानुमानों के बीच वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यिम का मानना है कि 2020-21 में आर्थिक विकास की दर 2 फीसद रहेगी, पर ऐसा होता दिखता नहीं है। यह लगभग नामुमकिन है और इसके पीछे एक सरल तर्क है।

लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था बंद पड़ी रही

लॉकडाउन की वजह से अप्रैल और मई में अर्थव्यवस्था करीब-करीब बंद ही पड़ी रही। अगर यह मान कर चलें कि इन दो महीनो में केवल 50 फीसद आर्थिक गतिविधियां हुईं तब भी पूरे वित्तीय वर्ष में एक महीने की आर्थिक गतिविधि नष्ट हो चुकी है और ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन के खुलते ही सब कुछ पहले जैसे हो जाएगा। भले ही अर्थव्यवस्था आने वाले हफ्तों में धीरे-धीरे खुलती जाए, लेकिन महामारी कोविड-19 का नकारात्मक आर्थिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा।

जब तक महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली में कोरोना कम नहीं होगा तब तक अर्थव्यवस्था का चलना संभव नहीं

फिजिकल डिस्टेंसिंग इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली। इसकी वजह से तमाम लोगों का घर पर रहना जारी रहेगा और जाहिर है कि जब लोग घर पर ही रहेंगे तो वह बाहर जाकर पैसा नहीं खर्च करेंगे। तमाम व्यापारिक गतिविधियों जैसे सिनेमा हॉल, मॉल्स, रेस्त्रां, सैलून, कपड़े-आभूषण और इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें इत्यादि महामारी के असर से ग्रस्त रहेंगी। यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि जिन राज्यों में महामारी का अधिक प्रकोप है, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और दिल्ली, वे आर्थिक दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण हैं। जब तक इन राज्यों में महामारी की मार कम नहीं होगी तब तक अर्थव्यवस्था का पूरी तरह खुलना और सुचारू रूप से चलना संभव नहीं दिखता।

कारोबारियों ने मैदान में बने रहने के लिए कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया

कारोबारियों ने विपरीत हालात में मैदान में बने रहने और लागत में कटौती करने के लिए कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया है। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से लोग पहले ही अपनी नौकरी खो चुके हैं। बड़े शहरों से अपने मूल स्थानों की तरफ कूच करते हुए लोगों की भीड़ से यह स्पष्ट भी होता है। बिना काम के प्रवासी श्रमिकों के लिए और कोई विकल्प नहीं बचा था।

जो लोग कर्मचारियों को नहीं निकाल रहे हैं वे तनख्वाह काट रहे हैं

जो लोग कर्मचारियों को नहीं निकाल रहे हैं वे तनख्वाह काट रहे हैं। कई कंपनियों ने नई नौकरी के प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है या फिर पूरी तरह रोक लगा दी है। वेंडर भुगतान भी रोक दिया गया है। इस माहौल में लोग जीवित रहने के लिए बुनियादी जरूरत के सामान के अलावा अन्य चीजों की खरीदारी जोर-शोर से करेंगे, इसकी उम्मीद करना मुश्किल है।

ऑटोमोबाइल और संपत्ति की बिक्री पर काफी असर पड़ेगा

चूंकि अर्थव्यवस्था का भविष्य धुंधला नजर आ रहा है इसलिए ऑटोमोबाइल और संपत्ति की बिक्री पर भी काफी असर पड़ेगा। अभी वह समय बिल्कुल नहीं है कि लोग ईएमआइ के भुगतान वाले चक्रव्यूह में फंसना चाहें। ऑटोमोबाइल या घर खरीदने के लिए अग्रिम भुगतान करने की भी जरूरत होती है, लेकिन अभी लोग यही बेहतर समझेंगे कि जो पैसा है वह बैंक अकाउंट में ही पड़ा रहे। वर्ष 2019-20 के दौरान ऑटोमोबाइल और घरों की बिक्री वैसे भी धीमी हो गई थी। यदि इन दोनों ही क्षेत्रों के लिए वर्ष 2019-20 खराब था तो कल्पना कीजिए कि इस वर्ष क्या होने वाला है?

मौजूदा हालात में आर्थिक अस्तित्व बनाए रखना एक बड़ी चुनौती

महामारी के प्रकोप के पहले से ही लोगों के मन में स्लोडाउन को लेकर भय बैठ गया था। अब लोगों के मन में मंदी की आशंका घर कर गई है। जैसे- जैसे नौकरियां जा रही हैं और वेतन में कटौती हो रही है वैसे-वैसे हर किसी के जानने वालों में कोई न कोई ऐसा मिल जा रहा जो इस दर्द को झेल रहा होगा। इसी तरह ऐसे लोग भी होंगे जिनका काम-धंधा मंदा पड़ रहा होगा या उसके ठप होने की नौबत आ गई होगी। मौजूदा हालात में आर्थिक अस्तित्व बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इस कठिन समय लोग सिर्फ और सिर्फ वैसी हो चीजों पर अपने पैसे खर्च करेंगे, जिनकी वर्तमान में सबसे ज्यादा जरूरत होगी, जैसे भोजन, दवाई, मोबाइल, इंटरनेट, हाउसिंग रेंट्स, होम लोन की ईएमआइ आदि। इसके अलावा घरेलू जरूरत के सामान-साबुन, डिटर्जेंट, शैंपू, टूथपेस्ट, टूथब्रश आदि की खरीद होगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर रिजर्व बैंक गवर्नर की बात सही साबित होने वाली है

जब कोई अपनी नौकरी से हाथ धो बैठता है या फिर उसके वेतन में कटौती हो जाती है अथवा उसका व्यापार ठप हो जाता है तो उसका व्यवहार खर्च के लिहाज से पहले की तरह नहीं रहता। ऐसे माहौल में वैसे लोगों की मन:स्थिति भी बदल जाती है जो परेशानियां नहीं झेल रहे होते हैं। ऐसे लोगों का बर्ताव भी ठीक वैसा ही हो जाता है जैसा वाकई में परेशानी उठा रहे लोगों का हो जाता है। इसलिए यही कहना सुरक्षित होगा कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की बात सही साबित होने वाली है। हमारी आर्थिक परेशानियां अभी बस शुरू ही हुई हैं।

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