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कृषि कानून विरोधी आंदोलन के पक्ष में पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा का ट्वीट भारत को बदनाम करने की साजिश

दिल्ली के सीमांत इलाकों में धरने पर बैठकर हठधर्मिता का परिचय दे रहे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसान संगठनों के समर्थन में भारत विरोधी ताकतों का सक्रिय हो जाना चिंताजनक है। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के पक्ष में स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने जैसे ट्वीट किए, वे भारत के खिलाफ साजिश की ही कहानी कहते हैं। उनके ट्वीट ने साबित किया कि वह भारत विरोधी तत्वों के हाथों में खेल रही हैं। गायिका रिहाना के ट्वीट के पीछे भी कनाडा में बैठे खालिस्तानियों का हाथ माना जा रहा है।

खालिस्तानी कृषि कानून विरोधी आंदोलन को हवा देने और भारत के खिलाफ जहर उगलने में लगे हुए है

ध्यान रहे कि कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में सक्रिय खालिस्तानी कृषि कानून विरोधी आंदोलन को हवा देने के साथ भारत के खिलाफ जहर उगलने में लगे हुए हैं। ग्रेटा ने अपने ट्वीट के जरिये जो गूगल टूल किट शेयर की, उसे भी तैयार करने का संदेह कनाडा के खालिस्तानियों पर ही है। यह टूल किट भारत को बदनाम करने और यहां अराजकता फैलाने की साजिश का दस्तावेज ही है। ग्रेटा के गुनाह की पुष्टि इससे होती है कि जब उनकी टूल किट भारत विरोधी एजेंडे से लैस दिखी तो उन्होंने उसे हटा लिया। उनके ऐसा करने के पहले ही भंडाफोड़ हो गया। ग्रेटा की हरकत से यह भी साफ हो गया कि वह पर्यावरण रक्षा का ढोंग कर रही हैं। आखिर कोई पर्यावरण हितैषी इसकी वकालत कैसे कर सकता है कि किसानों को प्रदूषण फैलाने वाली पराली जलाने की आजादी मिले?

ग्रेटा और रिहाना को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से विदेश मंत्रालय ने किया आगाह

यह अच्छा हुआ कि ग्रेटा और रिहाना की हरकत को विदेश मंत्रालय ने भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करार देते हुए उन्हें भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से आगाह किया। अच्छी बात यह भी हुई कि यही काम आम तौर पर राजनीतिक मसलों पर चुप रहने वाले क्रिकेटरों और फिल्मकारों ने भी किया। सबसे दयनीय यह रहा कि कुछ बुद्धिजीवियों के साथ मीडिया वालों का एक धड़ा इन क्रिकेटरों और फिल्मकारों की निंदा करने में जुट गया। ऐसा करके उन्होंने यही जाहिर किया कि वे सरकार और देश के विरोध में अंतर करना भूल गए हैं। ये वही लोग हैं जो किसान नेताओं की तरह यह बताने को तैयार नहीं कि आखिर कृषि कानूनों में खामी क्या है? यही हाल किसान नेताओं को उकसाने में जुटे विपक्षी नेताओं का भी है। उनके पास कृषि मंत्री के इस सवाल का कोई जवाब नहीं कि कथित काले कानूनों में काला क्या है और उनसे किसानों को नुकसान कैसे होगा?

इंटरनेट आधारित प्लेटफार्म दुष्प्रचार करने और सनसनी फैलाने का जरिया बन गए

ग्रेटा और रिहाना की हरकत से यह भी स्पष्ट हुआ कि इंटरनेट आधारित प्लेटफार्म किस तरह दुष्प्रचार करने और सनसनी फैलाने का जरिया बन गए हैं। इस मामले में ट्विटर सबसे आगे है। जब भारत सरकार ने ट्विटर से भड़काऊ ट्वीट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की तो उसने उसे अनसुना कर दिया। यह वही ट्विटर है, जिसने कुछ समय पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके कुछ साथियों को इस आधार पर प्रतिबंधित कर दिया था कि उनके ट्वीट लोगों को गुमराह करने और अशांति फैलाने वाले हैं। आखिर ट्विटर भारत सरकार की मांग पर भी घोर आपत्तिजनक ट्वीट करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करना चाहता? उसके रवैये से यह साफ है कि वह एक खास एजेंडे पर काम कर रहा है। उसके गलत इरादों को देखते हुए उसके खिलाफ कोई न कोई कार्रवाई होनी चाहिए, अन्यथा आगे वह और अधिक मनमानी कर सकता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को भड़काने वाली बातों को सहन नहीं किया जा सकता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आधारहीन, असत्य और लोगों को भड़काने वाली बातों को सहन नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य से ट्विटर सरीखे प्लेटफार्म यही काम कर रहे हैं। वे ऐसे अतिवादी तत्वों को संरक्षण दे रहे हैं जो बैर भाव बढ़ाने के साथ लोगों को गुमराह करते हैं। ट्विटर जैसे प्लेटफार्म लोगों को अपनी बात कहने की सुविधा प्रदान करने के नाम पर आए, लेकिन अब वे अलग-अलग देशों में खास तरह की विचारधारा को प्रोत्साहन दे रहे हैं। वे खुद को नफरत के खिलाफ बताते हैं, लेकिन कई देशों में नफरत फैलाने वालों को ही संरक्षण देते हैं। यदि उनकी मनमानी पर लगाम नहीं लगी तो वे सिरदर्द साबित हो सकते हैं।

ट्विटर भारत के कानूनों के हिसाब से चलें, कृषि कानूनों पर हो रहे दुष्प्रचार पर लगाम लगनी चाहिए

भारत सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि ट्विटर सरीखे प्लेटफार्म भारत के कानूनों के हिसाब से चलें। इसी के साथ सरकार को कृषि कानूनों पर हो रहे दुष्प्रचार पर भी लगाम लगानी होगी, क्योंकि अब इस दुष्प्रचार में विपक्षी दल भी शामिल हैं। वे यह देखने-सुनने को तैयार नहीं कि अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने किस तरह यह स्पष्ट किया कि एमएसपी में लगातार इजाफा हो रहा है। उन्होंने विस्तार से बताया कि राजग सरकार ने 2014-19 के बीच गेहूं और चावल की खरीद के लिए आठ लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि 2009-14 के बीच यह आंकड़ा महज 3.74 लाख करोड़ रुपये का था।

लोकतंत्र में सभी को विरोध का अधिकार है, लेकिन कुतर्क का कोई इलाज नहीं

लोकतंत्र में सभी को विरोध का अधिकार है, लेकिन कुतर्क का कोई इलाज नहीं। अति वामपंथी सोच से ग्रस्त कांग्रेस विरोध के नाम पर कुतर्क ही करने में लगी हुई है। अर्थशास्त्री एक अर्से से यह कहते आ रहे हैं कि किसानों को बिचौलियों से मुक्त कराने और उन्हें मुक्त बाजार से जोड़ने की जरूरत है। इस जरूरत को कांग्रेस ने भी समझा और उसने इन बातों को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया, लेकिन जैसे ही पंजाब के कुछ किसान संगठन सड़कों पर उतरे, वह भी पटरी से उतर गई। अब वह कृषि कानूनों के अंधविरोध पर आमादा है। यही स्थिति किसान संगठनों की भी है। वे कृषि कानूनों में बदलाव के सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर रहे हैं और फिर भी उसी पर तोहमत मढ़ रहे।

मोदी सरकार कृषि कानूनों की खामी दूर करने को तैयार, लेकिन जिद पर अड़े किसान

चूंकि मोदी सरकार कृषि कानूनों की कथित खामी दूर करने को तैयार है, जैसा कि गत दिवस राज्यसभा में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी कहा, इसलिए उसे अपनी जिद पर अड़े किसान नेताओं के आगे और झुकने की जरूरत नहीं। आखिर झुकने की भी एक सीमा होती है। चूंकि कृषि कानून विरोधी आंदोलन मूलत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित है इसलिए यह स्वत: स्पष्ट है कि शेष देश के आम किसानों को इन कानूनों से कोई परेशानी नहीं और उन्हें मोदी सरकार पर भरोसा है। इन स्थितियों में बेहतर यही होगा कि सरकार कृषि कानूनों के वही प्रविधान संशोधित करे जिन्हें किसान नेता और विपक्ष किसानों के लिए हानिकारक साबित कर दें।

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