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धार्मिक

एकाग्रता की सीख अर्जुन से लें  

हमें शुरुआत से ही बार-बार ध्यान लगाकर काम करने की सीख दी जाती है पर वर्तमान में इस पर गौर किया जाए, तो ध्यान की कमी नजर आती है। एकाग्रता के संबंध में धनुर्धर अर्जुन से सीख लें। अर्जुन को अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता था।

जब मन एक कार्य पर एकाग्र होता है, उस समय ध्यान की तीव्रता अत्यधिक बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप आप कार्यों को भली-भांति संपन्न करते हैं। आज के समय में जब प्रतियोगिता इतनी अधिक बढ़ गई है तो गहन कार्य या पूर्ण एकाग्रता के साथ काम करना न सिर्फ समय का सदुपयोग है, बल्कि समय नियोजन भी है। अस्त-व्यस्त दिनचर्या की अगर कोई काट है तो वह मानसिक एकाग्रता के साथ संपन्न किया गया कर्म ही है। अगर आप इसे जीवन का धर्म बना लें तो इसके बाद आपकी क्षमता पूर्ण रूप से विकसित हो पाती है।

उपनिषदों में दो शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- कर्म और धर्म। धर्म का अर्थ है हमारा स्वभाव और कर्म जो हम करते हैं। कर्म में हमारी दृष्टि बाहर की ओर होती है और धर्म हमें अपने अंदर की ओर मोड़ देता है, अपने अंतर्मन की ओर। मन को लेकर हमें ज्ञात है कि इसे नियंत्रण में करना अति कठिन है, क्योंकि मन में भांति-भांति के उद्वेग उठते रहते हैं। इसे मन का विकार कहते हैं और जब यह मन विचलन से रहित हो जाता है उस शांत निर्विकार दशा को आत्मा कहते हैं।

एकाग्रता वह बिंदु है जहां पर धर्म और कर्म आपस में मिल जाते हैं और व्यक्ति स्वयं को लक्ष्य के प्रति समर्पित कर देता है। इसके बाद आप को अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता है। फिर कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती है।

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